दो रास्ते ...
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दो रास्ते ...

मुकुंद गुरु युक्तेश्वर गिरिजी के कृपापात्र सतशिष्य थे | गुरु-आश्रम में रहकर गुरुसेवा करते-करते उन्होंने गुरु-महिमा को अच्छी तरह जाना था | गुरूजी ने प्रसन्न होकर उन्हें आश्रम का सारा कार्यभार सौंप दिया |
इसके १५ दिन बाद ही पूर्व बंगाल से कुमार नाम का एक युवक शिक्षा प्राप्त करने आश्रम आया | वह अपनी प्रखर बुद्धि के प्रभाव से शीघ्र ही गुरूजी का प्रेमपात्र बन गया | एक महिना बीता, गुरूजी ने मुकुंद को आज्ञा दी : ‘मुकुंद ! अब कुमार तुम्हारा काम सँभालेगा और तुम अपना समय झाड़ू तथा रसोई आदि के कामों में लगाओ |’
सच्चा शिष्य किसी भी परिस्थिति में अपने गुरु में दोषबुद्धि नहीं करता | वह किसी सेवा को छोटी या बड़ी नहीं समझता | चाहे झाड़ू-बुहारी की ही सेवा क्यों न मिले, वह शबरी की नाई अहोभाव से भरकर सेवा करता है | उसके लिए तो बस गुरु-वचन ही सब कुछ होता है | ‘रामायण’ में भी आता है :आज्ञा सम नहीं साहिब सेवा | ‘ गुरुआज्ञा–पालन के समान उत्तम परमात्मा की ओर कोई सेवा नहीं है |’ 
दिखावे के लिए या अपनी बात मनवाने के लिए गुरुभक्ति का आश्रय लेना एक बात है और अंतमुर्ख होकर स्वकल्याण के लिए शास्त्रानुसार गुरुभक्ति करना दूसरी बात है | दुसरे प्रकार का लक्ष्यनिष्ठ, आज्ञापालक साधक ही पूर्ण गुरु की पूर्ण कृपा पचाने में सफल हो पाता है | मुकुंद भी उसी रास्ते का पथिक था | वह तो गुरुआज्ञा पाते ही गुरु के प्रति अहोभाव से भरकर तुरंत अपनी सेवा में लग गया | किंतु पदोन्नति पाकर कुमार के अहं को मानो पंख लग गये | वह  आजकल का स्वतंत्र अर्थात स्वेच्छाचारी शासक बन गया, जैसा मन में आता वैसा करता | सब उसके शासन से परेशान हो गये | चुप विरोध के रूप में हर कोई मुकुंद से ही सलाह लेने जाता | यह बात कुमार को पसंद नहीं आती थी |
आखिर ३ हफ्ते बाद उसने गुरूजी के आगे अपने द्वेष का जहर उगला : “ गुरूजी ! आपने मुझे निरीक्षक नियुक्त किया है पर सब लोग मुकुंद के पास जाते है, उसीका कहना मानते है |”
तब गुरूजी ने उसे शिष्यत्व की पहचान बताते हुए कहा : “ यही कारण है कि सेवा सौंपी, ताकि तुम यह समझ सको कि योग्य शिष्य में केवल सेवा करने की आकांक्षा होती है, शासन करने की नहीं | सेवा अपनी और दूसरों की उन्नति के लिए होती है, न कि अहं सजाने के लिए | तुम मुकुंद की जगह चाहते थे, परंतु तुम अपने गुणों द्वारा उसे सँभाल नहीं सके | अब तुम पुन: रसोइये के सहायक के रूप में सेवा करो |”
जो अहं जीव को जन्मों से दुःख देता आया है और जन्मों तक दुःखदायी बनेगा उसीसे छुड़ाने हेतु करुणासिंधु गुरूजी उसके अहं पर चोट कर रहे थे परंतु कुमार ने उसे अपने ऊपर ले लिया | मुकुंद से उसका ईर्ष्या-द्वेष बढ़ने लगा | सद्गुरु द्वारा अमोलक, पतितपावन ज्ञान पाकर भी जो ऐसे सद्गुरु में दोष-दर्शन करता है, गुरुभाइयों से ईर्ष्या-द्वेष करता है, उसके पाप उसे घोर पतन की ओर ले जाते है, गुरुद्वाररुपी परम उत्तम सुरक्षा-कवच से बाहर लाने की कोशिश में लग जाते हैं और हुआ भी ऐसा ही |
एक वर्ष बीता| कुमार ने गुरूजी से गाँव जाने की आज्ञा माँगी | गुरूजी मौन रहे परंतु उनके मौन द्वारा की गई अस्वीकृति की अवहेलना कर वह गाँव चला गया | कुछ महीनों बाद वह लौटा तो आकर्षक और तेजस्वी कुमार की जगह एक निस्तेज, जीवन से थका-हारा साधारण किसान सामने था | युक्तेश्वरजी की आँखों में आँसू छलछला आये पर शीघ्र ही उन्होंने अपने को सँभाल लिया और मुकुंद से कहा : “मुकुंद ! कल ही उसे आश्रम से निकल जाने के लिए कह देना | अब वह आश्रम-जीवन के योग्य नहीं रहा |”
ऊपर से कठोर दिखनेवाले सद्गुरु के ह्रदय की कोमलता मुकुंद के सामने पुन: प्रकट हुई : “मुकुंद ! बुद्धि एक दोधारी तलवार है | चाहो तो छुरी की तरह उससे अज्ञान के फोड़े को चिर डालो या चाहो तो अपनी गर्दन काट डालो | यदि इस लडके ने मेरा कहा माना होता तो आज कुसंगत में पडकर इसका पतन नहीं होता | इसने सद्गुरु–संरक्षण का परित्याग कर दिया | अब कठोर संसार ही इसका गुरु रहेगा |”
संसार में केवल सच्चे सद्गुरु ही निर्दोष प्रेमी होते है जिनकी दृष्टि केवल शिष्य के स्वरुप पर होती है | शिष्य को आत्मस्वरूप में जगाने के लिए, युक्तिपूर्वक उसके चित्त को स्थिर करके भगवान की तरफ लगाने के लिए ही वे हर चेष्टा करते है | किंतु उस शिष्य के दुर्भाग्य का क्या पार, जो ऐसे सद्गुरु को छोडकर संसार में सुखी होने की दौड़ में भाग जाता है | उसके लिए तो अंतत: जन्म-मरण में भटकने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचता |
दो रास्ते है – एक रास्ता है मुकुंद का, जो गुरुआज्ञा के सुरक्षा-कवच में रहकर परम कल्याण की मंजिल पर सुनिश्चित रूप से पहुँचता है |  गुरुकृपा से मुकुंद, स्वामी योगानंदजी के रूप में परिणत हुए | दूसरा रास्ता है कुमार का, जो दुर्लभ मनुष्य-जीवन में सौभाग्य के परम शिखर तक पहुँचकर भी मनमुखता की खाई में गिरकर सुवर्ण अवसर खो देता है |
जो किन्ही भी संत-महापुरुषों के आश्रमों में निवास का सौभाग्य पाए हुये है, उन सभी साधुओं-साधकों को मुकुंद से बने स्वामी परमहंस योगानंद और उनके गुरुभाई का यह प्रसंग बार-बार पढना व मनन करना हितकारी होगा |
 

स्त्रोत – ऋषिप्रसाद जून २०१३ से  
 

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