सच्चा सम्राट
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सच्चा सम्राट

ज्योतिष विद्या का एक प्रकांड पण्डित कहीं से गुजरा और यह देखकर दंग रह गया कि ... ‘ये पदचिन्न ! किसी

चक्रवर्ती सम्राट के पदचिन्न ! सामुद्रिक लक्षण जाननेवाले ज्योतिषी ने सोचा ... ‘एक चक्रवर्ती सम्राट ! इस रास्ते

से ! ...और नंगे पैर गया ! सम्राट यदि जाये तो सवारी पर जाये एवं साथ में सेना हो किन्तु यह पदचिन्न तो एक

ही व्यक्ति के हैं ! क्या मेरा ज्योतिष मुझे धोखा दे रहा है ? उसने उन पदचिन्न का अनुसरण किया अंत में उसने

देखा कि एक भिक्षुक ध्यान में बैठा है और वहीं जाकर पदचिन्न समाप्त हुए हैं

उसने थोडी देर इन्तजार किया भिक्षुक जब ध्यान से उठा तब ज्योतिषी ने कहा ... ‘‘लगता है आज मेरा

ज्योतिष झूठा पड गया ये पदचिन्न तो किसी सम्राट के हैं और आप एक भिक्षुक !

वे भिक्षुक और कोई नहीं, महावीर स्वयं थे ज्योतिषी की बात सुनकर वे बोले ...

राजा की क्या पहचान है ? ज्योतिषी ... ‘‘राजा अकेला नहीं होता है लेकिन आप अकेले हैं

 महावीर ... ‘‘नहीं... निर्विकल्प ध्यानरूपी पिता मेरे साथ हैं, अहिंसारूपी मेरी माता मेरे

साथ है, ब्रह्मचर्यरूपी भाई मेरे साथ है और अनासक्तिरूपी बहन मेरे साथ है, शांतिरूपी

प्रिया मेरे साथ है, विवेकरूपी पुत्र मेरे साथ है और क्षमारूपी पुत्री मेरे साथ है उपशमरूपी

घर और सामान मेरे साथ हैं सत्यरूपी मित्र मेरे साथ है, फिर मैं अकेला कैसे ?

ज्योतिषी ... ‘‘अब मुझे समझ में आया कि सामुद्रिक लक्षण केवल बाह्य चीजों

पर ही आधारित नहीं होते मनुष्य में बहुत सारी संभावनाएँ छुपी हुई हैं वह अगर

उसका सदुपयोग करता है तो सच्चा सम्राट बन जाता है

राजा की सेना तो सीमित होती है लेकिन आपकी शुभ तरंगें राजा की सेना से

भी ज्यादा दूर तक फैली रहती हैं आपका धर्मचक्र एवं विचाररूपी वायु चारों तरफ

आनंद, शांति एवं माधुर्य फैलाता रहता है

स्वामी ! आपका राज्य ही वास्तविक राज्य है आज मेरा ज्योतिष सचमुच में

सार्थक हो गया कि मुझे आप जैसे सच्चे सम्राट के दीदार हो गये एवं आपके राज्य

का ज्ञानश्रवण करने के लिए अवसर मिला

 संकल्प ... ‘हम भी ध्यान, ब्रह्मचर्य, अनासक्ति, विवेक, सत्य और शांति के द्वारा अपने मन के सम्राट जरूर बनेंगे

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