Uttarayan - Festival to raise oneself
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Uttarayan - Festival to raise oneself

उत्तरायण पर्व के दिवस से सूर्य दक्षिण से उत्तर की ओर चलता है। उत्तरायण से रात्रियाँ छोटी होने लगती हैं, दिन बड़े होने लगते हैं. अंधकार कम होने लगता है और प्रकाश बढ़ने लगता है।

जैसे कर्म होते हैं, जैसा चिंतन होता है, चिंतन के संस्कार होते हैं वैसी गति होती है, इसलिए उन्नत कर्म करो, उन्नत संग करो, उन्नत चिंतन करो। उन्नत चिंतन, उत्तरायण हो चाहे दक्षिणायण हो, आपको उन्नत करेगा।

इस दिन भगवान सूर्यनारायण का मानसिक ध्यान करना चाहिए और उनसे प्रार्थना करनी चाहिए कि हमें क्रोध से, काम विकारों से चिंताओं से मुक्त करके आत्मशान्ति पाने में गुरू की कृपा पचाने में मदद करें। इस दिन सूर्यनारायण के नामों का जप, उन्हें अर्घ्य-अर्पण और विशिष्ट मंत्र के द्वारा उनका स्तवन किया जाय तो सारे अनिष्ट नष्ट हो जाएंगे, वर्ष भर के पुण्यलाभ प्राप्त होंगे।

ॐ ह्रां ह्रीं सः सूर्याय नमः । इस मंत्र से सूर्यनारायण की वंदना कर लेना, उनका चिंतन करके प्रणाम कर लेना। इससे सूर्यनारायण प्रसन्न होंगे, नीरोगता देंगे और अनिष्ट से भी रक्षा करेंगे। रोग तथा अनिष्ट का भय फिर आपको नहीं सताएगा। ॐ ह्रां ह्रीं सः सूर्याय नमः । जपते जाओ और मन ही मन सूर्यनारायण का ध्यान करते जाओ, नमन करो।

ॐ सूर्याय नमः । मकर राशि में प्रवेश करने वाले भगवान भास्कर को हम नमन करते हैं। मन ही मन उनका ध्यान करते हैं। बुद्धि में सत्त्वगुण, ओज़ और शरीर में आरोग्य देनेवाले सूर्यनारायण को नमस्कार करते हैं।

नमस्ते देवदेवेश सहस्रकिरणोज्जवल।

लोकदीप नमस्तेsस्तु नमस्ते कोणवल्लभ।।

भास्कराय नमो नित्यं खखोल्काय नमो नमः।

विष्णवे कालचक्राय सोमायामातितेजसे।।

हे देवदेवेश! आप सहस्र किरणों से प्रकाशमान हैं। हे कोणवल्लभ! आप संसार के लिए दीपक हैं, आपको हमारा नमस्कार है। विष्णु, कालचक्र, अमित तेजस्वी, सोम आदि नामों से सुशोभित एवं अंतरिक्ष में स्थित होकर सम्पूर्ण विश्व को प्रकाशित करने वाले आप भगवान भास्कर को हमारा नमस्कार है।

(भविष्य पुराण, ब्राह्म पर्वः 153.50.51)

उत्तरायण के दिन भगवान सूर्यनारायण के इन नामों का जप विशेष हितकारी है। ॐ मित्राय नमः। ॐ रवये नमः। ॐ सूर्याय नमः। ॐ भानवे नमः। ॐ खगाय नमः। ॐ पूष्णे नमः। ॐ हिरण्यगर्भाय नमः। ॐ मरीचये नमः। ॐ आदित्याय नमः। ॐ सवित्रे नमः। ॐ अर्काय नमः। ॐ भास्कराय नमः। ॐ सवितृ सूर्यनारायणाय नमः।

उत्तरायण देवताओं का प्रभातकाल है। इस दिन तिल के उबटन व तिलमिश्रत जल से स्नान, तिलमिश्रित जल का पान, तिल का हवन, तिल का भोजन तथा तिल का दान सभी पापनाशक प्रयोग हैं।

उत्तरायण का पर्व पुण्य-अर्जन का दिवस है। उत्तरायण का सारा दिन पुण्यमय दिवस है, जो भी करोगे कई गुणा पुण्य हो जाएगा। मौन रखना, जप करना, भोजन आदि का संयम रखना और भगवत्-प्रसाद को पाने का संकल्प करके भगवान को जैसे भीष्म जी कहते हैं कि हे नाथ! मैं तुम्हारी शरण में हूँ। हे अच्युत! हे केशव! हे सर्वेश्वर! हे परमेश्वर! हे विश्वेश्वर! मेरी बुद्धि आप में विलय हो। ऐसे ही प्रार्थना करते-करते, जप करते-करते मन-बुद्धि को उस सर्वेश्वर में विलय कर देना। इन्द्रियाँ मन को सँसार की तरफ खीँचती हैं और मन बुद्धि को घटाकर भटका देता है। बुद्धि में अगर भगवद्-जप, भगवद्-ध्यान, भगवद्-पुकार नहीं है तो बुद्धि बेचारी मन के पीछे-पीछे चलकर भटकाने वाली बन जाएगी। बुद्धि में अगर बुद्धिदात की प्रार्थना, उपासना का बल है तो बुद्धि ठीक परिणाम का विचार करेगी कि यह खा लिया तो क्या हो जाएगा? यह इच्छा करूँ-वह इच्छा करूँ, आखिर क्या? – ऐसा करते-करते बुद्धि मन की दासी नहीं बनेगी। ततः किं ततः किम् ? – ऐसा प्रश्न करके बुद्धि को बलवान बनाओ तो मन के संकल्प-विकल्प कम हो जाएंगे, मन को आराम मिलेगा, बुद्धि को आराम मिलेगा।

ब्रह्मचर्य से बहुत बुद्धिबल बढ़ता है। जिनको ब्रह्मचर्य रखना हो, संयमी जीवन जीना हो, वे उत्तरायण के दिन भगवान सूर्यनारायण का सुमिरन करें, जिससे बुद्धि में बल बढ़े।

ॐ सूर्याय नमः……… ॐ शंकराय नमः……… ॐ गं गणपतये नमः………… ॐ हनुमते नमः……… ॐ भीष्माय नमः……….. ॐ अर्यमायै नमः………… ॐ ॐ ॐ ॐ

उत्तरायण का पर्व प्राकृतिक ढंग से भी बड़ा महत्वपूर्ण है। इस दिन लोग नदी में, तालाब में, तीर्थ में स्नान करते हैं लेकिन शिवजी कहते हैं जो भगवद्-भजन, ध्यान और सुमिरन करता है उसको और तीर्थों में जाने का कोई आग्रह नहीं रखना चाहिए, उसका तो हृदय ही तीर्थमय हो जाता है। उत्तरायण के दिन सूर्यनारायण का ध्यान-चिंतन करके, भगवान के चिंतन में मशगूल होते-होते आत्मतीर्थ में स्नान करना चाहिए।

उतरायण के दिन ” दुसरो  का अन्न खाने “ से ३ महीनो का पुण्य और संक्राति के दिन खाने से महीने से अधिक का पुण्य चला जाता हैं.

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