जब आजाद को बाँधी राखी
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जब आजाद को बाँधी राखी

अधिकतर हम राखी के दिन एक छोटी-सी भेंट ले-देकर खुशियाँ मनाते हैं । किंतु रक्षाबंधन तो एक-दूसरे की उन्नति के शुभ संकल्प का दिन है ।

रक्षाबंधन आपसी स्नेह-सौहार्द बढ़ाने व परस्पर मंगलकारी शुभ संकल्प करने का पावन पर्व है । पहले रक्षाबंधन बहन-भाई तक ही सीमित नहीं था, अपितु आपत्ति आने पर अपनी रक्षा के लिए अथवा किसी की आयुष्य और आरोग्य की वृद्धि के लिए किसीको भी रक्षासूत्र बाँधा और भेजा जाता था ।

श्रीकृष्ण-द्रौपदी, हुमायूँ-कर्मावती की कहानी तो सभी ने सुनी होगी परंतु आजादी के आंदोलन में भी कुछ ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जहाँ राखी ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है ।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जनजागरण के लिए भी इस पर्व का सहारा लिया गया । रवीन्द्रनाथ टैगोर ने बंग-भंग का विरोध करते समय बंगाल निवासियों के पारस्परिक भाईचारे तथा एकता
के प्रतीक रूप में रक्षाबंधन का त्यौहार मनाने की शुरुआत की थी ।

स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद के जीवन की एक मार्मिक घटना
रक्षाबंधन से जुड़ी है । आजाद एक बार तूफानी रात में शरण लेने हेतु एक विधवा के घर पहुँचे । पहले तो उसने उन्हें डाकू समझकर शरण देने से मना कर दिया, परंतु जब आजाद ने अपना परिचय दिया तब वह ससम्मान उन्हें घर के अंदर ले गयी ।

बातचीत के दौरान जब आजाद को पता चला कि उस विधवा को गरीबी के कारण जवान बेटी की शादी हेतु काफी परेशानियाँ उठानी पड़ रही हैं तो उन्होंने द्रवित होकर उससे कहा : ‘‘मेरी गिरफ्तारी पर 5,000 रुपये का ईनाम है, तु मुझे अंग्रेजों को पकड़वा दो और उस ईनाम से बेटी की शादी कर लो ।“

यह सुनकर विधवा रो पड़ी और बोली : ‘‘भैया ! तुम देश की आजादी के लिए अपनी जान हथेली पर रखकर चल रहे हो और न जाने कितनी बहू-बेटियों की इज्जत तुम्हारे भरोसे है । न मैं इतनी स्वार्थी हूँ और न ही गद्दार जो कि अपनी बेटी के लिए हजारों बेटियों का गला घोंट दूँ । मैं ऐसा हरगिज नहीं कर सकती |”

यह कहते हुए उसने एक रक्षासूत्र आजाद के हाथ में बाँधकर उनसे देश-सेवा का वचन लिया ।
रात बीती, सुबह जब उस विधवा की आँखें खुलीं तो आजाद जा चुके थे और तकिये के नीचे 5,000 रुपये रखे हुए थे । उसके साथ एक पर्ची पर लिखा था - ‘अपनी प्यारी बहन हेतु एक छोटी-सी भेंट’ - आजाद ।

सीख : राखी केवल एक मामूली धागा नहीं होता । राखी मतलब निःस्वार्थ, निष्काम प्रेम का सूत्र !
अधिकतर हम राखी के दिन एक छोटी-सी भेंट ले-देकर खुशियाँ मनाते हैं । किंतु रक्षाबंधन तो एक-दूसरे की उन्नति के शुभ संकल्प का दिन है ।
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