संत के सान्निध्य और दर्शन का फल
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संत के सान्निध्य और दर्शन का फल

गुरु नानकदेव जी घूमते-घामते किसी नगर के बाहर डेरा डाले हुए थे। भावुक श्रद्धालु लोग दर्शन करने गये। धीरे-धीरे बात राजा तक पहुँची और वह भी दर्शन करने गया। नया-नया राजा था, पहली बार जा रहा था किन्हीं संत के चरणों में।
राजा ने देखा कि नानक जी को सब लोग झुक-झुक के प्रणाम करते हैं, बड़े आदर से निहारते हैं और ये बाबाजी तो सब छोड़ के संत बने हैं। अब इनको लोग नमस्कार प्रणाम करें इसकी क्या जरूरत ! हम लोगों को कोई सलाम कर दे तो ठीक है, हमको जरा मजा भी आये। अब बाबा बन गये, घर-बार छोड़ दिया फिर प्रणाम करवाने की क्या जरूरत ! राजा के चित्त में संकल्प-विकल्प होते रहे।
नानकदेव तो नानकदेव थे। पूछाः
"क्या सोचता है भैया ?"
राजा बोलाः "बाबाजी ! गुस्ताफी माफ हो..." और राजा ने सारी बात कह दी।
नानक देव ने कहाः "अभी नहीं कहूँगा। कल सुबह आना।"

राजा अपने महल में चला गया, खाया-पिया और सोया। सो जाने पर सपना देखता है कि वह जंगल में शिकार करने गया। एक बढ़िया हिरन दिखा, उसके पीछे घोड़ा भगाये जा रहा है। हिरन हवा को गया। राजा साथियों से,मित्रों से जुदा हो गया और ऐसी जगह पर पहुँचा कि जहाँ कोई रास्ता ही नहीं मिलता। भूखा-प्यासा राजा भटक रहा है। जामुन का रस और चावल लिये एक चांडाली जा रही है। राजा चांडाली के आगे गिड़गिड़ाता हैः 'तू मुझे भोजन दे दे।'
चांडाली बोलती हैः 'हम लोग चांडाल हैं। बिना स्वार्थ के किसी से प्रीति नहीं करते। तुम मेरे भर्ता हो जाओ तो मैं तुम्हें खिलाऊँ।'
जो स्वार्थी होते हैं, जो चांडाल मन के होते हैं वे बिना मतलब किसी का उपकार नहीं करते और जो संत होते हैं वे कोई मतलब रखे बिना उपकार करते हैं। भूखा मरता हुआ राजा चांडाली के साथ हो गया। उसे छः-सात बच्चे हुए। दिन को तो पशुओं की हिंसा करे, रक्तपान करे, रात्रि को चर्म सुखाये। ऐसा जीवन बिताते-बिताते उसे बारह वर्ष बीत गये।

दुष्काल के दिन हैं। बारिश कम पड़ी है, तालाब सूख गया है। जानवर नहीं मिल रहे हैं। दो दिन-चार दिन तक कोई शिकार नहीं मिलता है। चांडाल बड़ा दुःखी होता है। घर जाता है तो बच्चे बोलते हैं- 'लाओ मांस।'
चांडाल बोलता हैः 'मांस नहीं है। मेरा ही मांस खा लो।' छोटा बच्चा बोलता हैः 'तुम्हारा ही दे दो।'
चांडाल के बच्चे भी चांडाल ! गुस्से में उस चांडाल ने अपना शरीर जलाने के लिए लकड़ियाँ इकट्ठी कीं,आग लगायी और उस आग में आत्महत्या करने के लिए ज्यों कूदा तो राजा पलंग से नीचे गिर पड़ा,आँख खुल गयी और धड़कन बढ़ गयी। देखा कि 'अरे ! मैं तो महल में सोया हूँ। शास्त्रों में लिखा है कि संत के दर्शन करने से दुःख दूर होते हैं। ऐसा मैंने सुन रखा है परंतु हुआ उलटा ! नानकजी के दर्शन किये और रात हराम हो गयी ! इतने दिन तो बड़े मधुर सपने देखे पर इस रात खुद के चांडाल होने के बारह वर्ष जो देखे हैं, बड़े जुल्म के, बड़े बुरे देखे।'
ब्रहम गिआनी का दरसु बडभागी पाईये।
ब्रहम गिआनी कउ बलि बलि जाईये।
ब्रहम गिआनी की मिति कउनु बखानै।
ब्रहम गिआनी की गति ब्रहम गिआनी जानै।
चारि पदारथ जे को मागै। साध जना की सेवा लागै।
जे को आपुना दूखु मिटावै। हरि हरि नामु रिदै सद गावै।
जे को जनम मरण ते डरै। साध जना की सरनी परै।
(सुखमनी साहिब)

राजा सुबह होते ही नहा-धो के गुरुनानक के पास पहुँच गया। बोलाः "बाबाजी ! मेरी रात क्यों खराब हो गयी ? आपके दर्शन के बाद तो आदमी को तसल्ली से सोना चाहिए पर मेरी नींद हराम हो गयी। मैंने बड़ी बुरी तरह का सपना देखा।"
नानकदेव जी बोलते हैं- "क्या सपना देखा, मैं बता देता हूँ तुझे।" और नानक जी ने सारी बात बताते हुए कहाः "राजा का फर्ज होता है प्रजा का पालन करना। इसके लिए प्रजा से कर (Tax) लिया जाता है, प्रजा का खून-पसीना लिया जाता है। उसकी रक्षा, उसके हित के लिए तूने खून-पसीना तो नोचा परंतु प्रजा के उस खून को प्रजा के उपयोग में न लगाकर तूने उससे विलास किया है। इसलिए दूसरा जन्म तुझे चांडाल का मिलने वाला था, परंतु संत से पास आया तो वह संत के सान्निध्य और दर्शन से सपने में पूरा हो गया।"

अभी जीव विज्ञान की घोषणा है कि सज्जन आदमी, प्रेम से भरा हुआ, करूणा से भरा हुआ, शांति से भरा हुआ, परोपकार से भरा हुआ सत्पुरुष जब किसी बीमार व्यक्ति को निहारता है तो उसकी आँखों की रश्मियाँ, आँखों की आभा पड़ने से बीमार व्यक्ति के अंदर स्वास्थ्य सर्जन करने वाले रक्त के श्वेत कण प्रत्येक घन मि.मी. रक्त में 1500 की संख्या से बढ़ जाते हैं और दुष्ट आदमी जब निगाह डालता है तो प्रति घन मि.मी. रक्त में 1600 श्वेत कण नष्ट हो जाते हैं। अभी विज्ञान सिद्ध करता है पर नानकजी, कबीर जी, लीलाशाहबापूजी आदि महापुरुषों ने सैंकड़ों वर्ष पहले घोषणा कर दी।
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