जला दो उसीको जिसने दी जलन
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जला दो उसीको जिसने दी जलन

गुरु-सन्देश
हे प्रभु ! आनन्ददाता ज्ञान हमको दीजिए ।
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिये ।।
निंदा किसीकी हम किसी से भूलकर भी न करें ।
ईर्ष्या कभी भी हम किसी से भूलकर भी न करें ।।

"अभिज्ञान शाकुन्तलम्" के रचियता महाकवि कालिदास की प्रसिद्धि बढ़ती ही जा रही थी । उनकी रचनाएँ पढ़कर लोग आनंदित होते थे पर प्रसिद्धि देखकर जलानेवाले,उनसे द्वेष करनेवाले लोग भी कम नहीं थे । पंडित भवभूति,जो उस समय का प्रसिद्ध विद्धान था, वह कवि कालिदास से द्वेष करता था । उनकी चारों ओर हो रही प्रशंसा ने उसका चित्त विचलित कर दिया था। अतः उसने ईर्ष्यावश एक नाटक लिखा और उसका मंच पर आयोजन करवाया । साहित्यिक दृष्टि से नाटक सुंदर था,फिर भी दर्शकों की संख्या गिनी-चुनी ही रही और जो आये थे वे भी बीच में से ही उठकर जाने लगे ।

यह देखकर भवभूति को भारी निराशा हुई । घर लौटकर उसने उस नाटक को अग्निदेव को समर्पित कर दिया । पिता ने देखा तो ऐसा करने का कारण पूछा।

वह बोला :"जिसे लोग पसंद ही नहीं करते,ऐसे नाटक को रखकर मै क्या करूँगा !"
पिता ने कहा :"पुत्र ! दूसरों पर दोषारोपण करने के बदले तुम्हें आत्मनिरीक्षण करना चाहिए ।"
"पिताजी ! इसमें मेरा क्या दोष है ?"
"तुम्हारा उद्देश्य कालिदास को नीचा दिखाने के लिए ही तुमने इस नाटक की रचना की थी । तुमने भोजपत्र के पन्ने तो जला दिये पर वास्तव में तुम्हें अपने अंदर स्थित ईर्ष्या की मलिन वृति को जलाना चाहिए था ।"

भवभूति को अपनी भूल समझ में आ गयी ।
पिता ने कहा :"पुत्र ! इस ग्रंथ की राख मस्तक पर लगा ले और फिर से ग्रंथ की रचना कर । मेरा आशीर्वाद है कि तू अवश्य सफल होगा ।"
इसके बाद भवभूति ने जो साहित्य-रचना की,वह लोगों के लिए अमूल्य धरोहर हो गयी और उसकी ख्याति चारों तरफ फैल गयी ।

सीख :"ईर्ष्या एक ऐसा घातक विष है कि यह जिसमें पैदा होता है,सबसे पहले उसी को मारता है । ईर्ष्यालु व्यक्ति अपनी योग्यताओं,संभावनाओं का गला खुद ही घोंट देता है । अतः हम दृढ़ संकल्प करें और भगवान से प्रार्थना करें- हे प्रभु ! आनन्ददाता ज्ञान हमको दीजिये ।....

📚लोक कल्याण सेतु/दिसम्बर २०१०
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