भाषा व संस्कृति का गौरव
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भाषा व संस्कृति का गौरव

(हिंदी भाषा दिवस -१४ सितम्बर)
-पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

'आनन्दमठ' जैसी कृति के लेखक बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय बंगाल में न्यायाधीश थे। वे वकीलों को अंग्रेजी की जगह बँगला का उपयोग करने की प्रेरणा दिया करते थे ।
एक दिन उनके न्यायालय में एक अग्रेंज वकील किसी मुकदमे की पैरवी करने आया । उसने बंकिम बाबू को बँगला बोलते देखा तो कहा :"शासन की भाषा अंग्रेजी है । आप इसकी जगह थोड़े-से क्षेत्र की भाषा बँगला का उपयोग क्यों करते हैं ?
आप तो अंग्रेजी के अच्छे जानकार भी हैं ।"

बंकिम बाबू ने उत्तर दिया : "शासन कितना भी प्रयास करे,एक विदेशी भाषा भारत जैसे विशाल देश की भाषा कदापि नहीं बन सकती। बंगाली बँगला भाषा को,हिंदी क्षेत्र के लोग हिन्दी को,
महाराष्ट्र के लोग मराठी भाषा को जिस सहजता से समझ सकते हैं,उस अनुपात में किसी विदेशी भाषा को कदापि नहीं समझ सकते ।"

उन्होंने कुछ रुककर कहा :"वकील साहब ! क्या आप समझते हैं कि तमाम भारतवासी अंग्रेजो के अधीन होने के बावजूद अंग्रेज बनाये जा सकते हैं ?
पाश्चात्य भाषा व पहनावे का असर कुछ लाख लोगों पर पड़ सकता है किंतु अधिकांश भारतवासी
अपनी भाषा व संस्कृति से ही प्रेरणा प्राप्त करते रहेंगे ।"
अंग्रेज वकील निरुत्तर रह गया ।

📚लोक कल्याण सेतु /जून-जुलाई २००७
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