दंड से नहीं,कर्तव्यहीनता से डरो
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दंड से नहीं,कर्तव्यहीनता से डरो

do not afraid of punishment rather do afraid of being irresponsible

एक बालक का विद्यालय जाने से पहले अपनी माँ के चरणस्पर्श करने का नियम था ।

एक दिन जल्दी जल्दी में वह माँ के चरणस्पर्श किये बिना ही विद्यालय के लिए निकल गया । रास्ते में उसे आचनक स्मरण हुआ कि 'आज तो मैं माँ के चरणस्पर्श करना भूल गया!' पलभर भी बिना कुछ सोचे-विचारे वह अपनी भूल सुधारने के लिए घर की ओर लौटने लगा ।

उसके मित्रों ने उसकी हँसी उड़ायी और बोले :"अरे !एक दिन माँ के पैर नहीं छुए तो क्या हो गया,कौन-सा पहाड़ टूटनेवाला है ! और पैर छूने के चक्कर में अगर समय पर विद्यालय में नहीं पहुँचोगे तो जरूर दंड मिलेगा ।"

बालक बोला :"दंड से बचने के लिए भूल न सुधारना अपनी अंतरात्मा को दबाना होगा ! क्या विद्यालय के दंड से यह कर्तव्यपलायनता का दंड अधिक कष्टकर न होगा ?"

सभी मित्र अवाक् रह गये । वह दृढ़निश्चयी बालक दंड की परवाह किये बिना घर पहुँचा,माँ के चरणस्पर्श करके क्षमा माँगी और फिर विद्यालय गया ।

उस दिन उस बालक को अपना कर्तव्य पूरी दृढ़ता और निष्ठा से निभाने के कारण विशेष आनंद व आत्मविश्वास का अनुभव हुआ । जानते हैं वह बालक कौन था ?
यह वही बालक था जो आगे चलकर भारत के महान स्वतंत्रता-सेनानी विनायक दामोदर सावरकर यानी वीर सावरकर के नाम से विख्यात हुआ ।

शिक्षा - माता-पिता व गुरु को प्रणाम करना,उनका आदर-सम्मान व आज्ञापालन करना - ये ऐसे सद्गुण हैं जो व्यक्ति को महानता की ऊँचाइयों पर पहुँचा देते हैं ।
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