कल्याण की गुरुनिष्ठा
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कल्याण की गुरुनिष्ठा

गुरुसेवा के लिए पूरे हृदय की इच्छा ही गुरूभक्ति का सार है ।
-परम पूज्य संत श्री आशारामजी बापूजी

एक बार समर्थ रामदासजी जब अपने शिष्यों के साथ भ्रमण-जनजागरण करते हुए महाराष्ट्र के कराड़ क्षेत्र में पहुँचे,तब वहाँ उनके शिष्यों ने संकीर्तन-यात्रा निकाली। मार्ग में स्थित आम के एक विशाल पेड़ की शाखा से धर्मध्वजा अड़ रही थी ।

लोग सोचने लगे,"ध्वजा को नीचे उतारकर आगे बढ़ना भगवद्-वैभव का अपमान करने जैसा होगा । अब क्या किया जाय ?" उस शाखा के नीचे एक गहरा कुआँ था। समर्थजी के मन में अपने शिष्यों की निष्ठा परखने का विचार आया ।

उन्होंने आदेश दिया :"शाखा काट दो । शाखा पर बैठकर शाखा के मूल पर वार करना है ।" निष्ठावान शिष्य भी एक-दूसरे के तरफ देखने लगे ।

अम्बादास(कल्याण) ने गुरुदेव को प्रणाम किया और बोला :"जो आज्ञा गुरुदेव !"
अम्बादास उस शाखा पर बैठकर उसके मूल पर वार करने लगा। समर्थजी की शिष्या वेणाबाई बोली :
"महाराज ! इस प्रकार शाखा कटते ही अम्बादास कुएँ में गिर पड़ेगा!"
समर्थ बोले :"गिरेगा तो गिरेगा !"
"गुरुदेव उसे तैरना नहीं आता।"
"तैरना नहीं आता तो डूबेगा,और क्या होगा !"

उधर अम्बादास शाखा काटने को लगा हुआ था। शाखा कटकर गिरने के कगार पर थी कि सभी लोग चिल्लाने लगे :"अम्बादास ! बस करो,नीचे उतरो नहीं तो कुएँ में गिरोगे ।"
अम्बादास बोला :"यदि गिर गया तो क्या है ! हमारे गुरुदेव तो अथाह संसार-सागर से जीवों को तारते हैं तो फिर यह जरा-सा कुआँ उनके लिए क्या मायना रखता है ! यह गुरुदेव का कार्य है और वे ही सँभाल रहे हैं ।"

इतने में वह शाखा कट गयी और अम्बादास,कुल्हाड़ी व शाखा,तीनों धड़ाम-से कुएँ में जा गिरे ।
सब शिष्य दौड़कर आये । समर्थ रामदास भी वहाँ आये । देखा तो पेड़ की वह शाखा इस प्रकार गिरी थी कि उसके ऊपरी भाग पर अम्बादास आराम से बैठा था,मानो किसी नाव में बैठा हो । अम्बादास को जरा भी खरोंच नहीं आयी ।

समर्थ बोले :"बेटा ! तुझे जरा-सा भी नहीं लगा न ?
अम्बादास ने कहा :"गुरुदेव ! सब आपकी दया है । आपने मेरा कल्याण कर दिया ।"
समर्थ बोले :"मैंने तो क्या कल्याण किया बेटा ! तेरी श्रद्धा-भक्ति ने,तेरी तत्परता ने,तेरी दृढ़ता ने ही गुरुकृपा,
भगवत्कृपा जागृत कर दी । आज से तेरा नाम मैं 'कल्याण' रखता हूँ ।"

सीख :"शिष्य की श्रद्धा-भक्ति,तत्परता,दृढ़ता,आज्ञापालन ही गुरुकृपा,
भगवत्कृपा को जागृत करती है ।

संकल्प : गुरूभक्ति की सुवास मेरे जीवन में भी आये।

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