बालक स्कंदगुप्त की वीरता
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बालक स्कंदगुप्त की वीरता

Bravery of Boy Skandagupta

 गुरु-सन्देश
उद्यम,साहस,धैर्य,बुद्धि,
शक्ति,पराक्रम ये छः गुण जिस समाज में,जिस व्यक्ति में आये,उसने परिस्तिथियों पर अपना साम्राज्य स्थापित किया । 

पाँचवी शताब्दी की बात है,भारत पर विदेशियों ने आक्रमण किया था । हूण,
यवन और शक अपने-अपने लाखों सैनिकों को लिये हमारे देश की सीमा की ओर बढ़ रहे थे । इन जातियों ने यूरोप और चीन को पददलित किया था और रोम साम्राज्य के टुकड़े-टुकड़े कर डाले थे । अब ये बर्बर भारत को भी अपने पैंरों-तले रौंदना चाहते थे ।

सम्राट कुमारगुप्त उस समय भारत के शासक थे । उनके १३ वर्षीय बेटे का नाम था स्कंदगुप्त । उसने आक्रमण का समाचार सुना तो दौड़कर सम्राट के मंत्रणा-गृह में घुस गया । यह १३ वर्ष का किशोर कहता है :" पिताजी मुझे आज्ञा दीजिए ।"
पिता ने कहा :" बेटा ! तू बच्चा है,अभी कच्चा है ।"
"पिताश्री ! उद्यम,साहस,धैर्य,बुद्धि शक्ति और पराक्रम जिसके पास है,वह परिस्तिथियों के सिर पर पैर रखकर अपना मकसद हासिल करता है ।

बेटे का उत्साह,वीरता और दृढ़ता देखकर पिता ने फौजी दिये और स्कंदगुप्त डंका बजाता-बजाता निकल पड़ा । जहाँ रात्रि होती वहाँ अपने सैनिकों में प्राणबल भरता,संकल्पबल भरता । यह वीर पंचनद की पहाड़ी सीमा और तलहटियों में दुश्मनों को सबक सिखाने चल पड़ा ।

पर्वतमाला के उस ओर हूणों की सेनाएँ थीं और इस ओर की  हरी-भरी समतल भूमि पर मगध की सेनाओं का पड़ाव था । पहाड़ की चोटी से युद्ध का शंखनाद हुआ । सफेद घोड़े पर चढ़ा हुआ स्कंदगुप्त आज दानवों का दलन करते हुए साक्षात् पार्वतीनंदन स्कंद-सा प्रतीत होता था । उसकी तलवार विद्युत-वेग से चलकर शत्रु-सेना का विध्वंस कर रही थी। देखते-ही-देखते हूण सेना भागने लगी और मगध नरेश का झंडा फहराया 13 वर्ष के बालक ने !

संकल्प :- तो तुम तो बड़े हो,समझदार हो,तुम भी संकल्प करो । छत्रपति शिवाजी,महाराणा प्रताप की यह कर्मभूमि है । संकल्प करो कि हमारा लक्ष्य भारतीय संस्कृति की ऊँचाइयों को छूना है ।

लक्ष्य न ओझल होने पाये
कदम मिलाकर चल ।
सफलता तेरे चरण चूमेगी आज नहीं तो कल ।।

लोक कल्याण सेतु /अप्रैल २०१६
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