पूज्य बापूजी का विद्यार्थी काल
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पूज्य बापूजी का विद्यार्थी काल

पूज्य बापू जी के बचपन का नाम आसुमल था। बालक आसुमल अमदावाद में मणिनगर के जयहिन्द हाईस्कूल में पढ़ते थे। उनकी स्मरणशक्ति विलक्षण थी। अपनी विलक्षण स्मरणशक्ति के प्रभाव से ही उन्होंने शिक्षक द्वारा सुनायी गयी एक लंबी कविता को एक ही बार सुनकर तुरंत पूरी-की-पूरी सुना दी तो सभी विद्यार्थी अध्यापक चकित रह गये

चित्त की एकाग्रता, बुद्धि की तीव्रता, नम्रता, सहनशीलता आदि के कारण आसुमल पूरे विद्यालय में सबके प्रिये बन गये। जब वे पाठशाला जाते तो उनके पिता जाते समय उनकी जेब में पिस्ता, बादाम, काजू, अखरोट भर देते। बालक आसुमल स्वयं तो खाते, अपने मित्रों को भी खिलाते। पढ़ने में भी वे बडे मेधावी थे। प्रतिवर्ष  प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होते थे, फिर भी इस सामान्य विद्या का आकर्षण उन्हें नहीं रहा। स्कूल के अन्य बच्चे जब खेलकूद रहे होते तो बालक आसुमल किसी वृक्ष के नीचे ईश्वर के ध्यान में तल्लीन हो जाते थे। बाल्यकाल से ही उनका मन लौकिक विद्या में नहीं अपितु ईश्वर की भक्ति में लगता था, इसलिए वे ज्यादा समय ध्यान भजन में ही लगे रहते। धीरे-धीरे उन्हें ध्यान का ऐसा स्वाद लगा कि जैसे मछली पानी के बिना नहीं रह सकती, उसी प्रकार वे भी ध्यान किये बिना नहीं रह पाते थे। 

इस प्रकार वे ब्रह्मविद्या से सम्पन्न होने लगे। उनका मानना था कि ‘विद्या वही है जो मुक्ति दिलाये।’ आसुमल देर रात तक पिता जी के पैर दबाते, उनकी सेवा से प्रसन्न होकर पिता जी ने आशीर्वाद दिया कि ‘बेटा! इस संसार में सदा तेरा नाम रहेगा और तुम्हारे द्वारा लोगों की मनोकामनाएँ पूर्ण होंगीं।’

✍🏻जैसे पूज्य बापू जी के जीवन में ये दैवी गुण बचपन से ही थे तो वे कितने महान बन गये, ऐसे ही अगर आप भी इन दैवी गुणों को अपने जीवन में लाओ तो आप भी अवश्य महान बन सकते हैं।

अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।

दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।।

‘भय का सर्वथा अभाव, अंतःकरण की पूर्ण निर्मलता, तत्त्वज्ञान के लिए ध्यानयोग में निरंतर दृढ़ स्थिति तथा सात्त्विक दान, इन्द्रियों का दमन, भगवान, देवता औ गुरुजनों की पूजा एवं अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मों का आचरण, वेद-शास्त्रों का पठन-पाठन तथा भगवान के नाम और गुणों का संकीर्तन, स्वधर्मपालन के लिए कष्ट सहन व शरीर तथा इन्द्रियों के सहित अंतःकरण की सरलता - ये सब दैवी संपदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।


(श्रीमद् भगवदगीताः 16.1)

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