गुरू-शिष्य परंपरा
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गुरू-शिष्य परंपरा

क्या आप जानते हैं कि स्वामी श्री लीलाशाहजी बापू कौन थे⁉ 

 वे थे हमारे गुरुदेव परम पूज्य संत श्री आसारामजी बापू के सदगुरु। उनकी कृपा से ही हमारे पूज्य सदगुरुदेव को आत्मसाक्षात्कार हुआ।

 गुरु-शिष्य परंपराः परम पूज्य बापू जी अपने साधनाकाल में तीर्थाटन करते हुए और जंगलों गुफाओं में घूमते हुए अंततः नैनीताल पहुँचे। तब उनका नाम आसुमल था। वहाँ उन्हें श्री लीलाशाहजी बापू मिले, उन्हें सदगुरु मानकर आसुमल उनके चरणों में रहकर सेवा साधना करने लगे।

70 दिन तक आसुमल को कठोर तितिक्षाएँ सहनी पड़ीं। वे केवल चार फुट की कोठरी में रहते थे, जिसमें ठीक से आसन भी नहीं कर पाते थे। भोजन में केवल मूँग का पानी अथवा उबले हुए मूँग लेते थे। गुरुदेव के नाम आये हुए पत्र पढ़ते एवं उनके बताये अनुसार उनका जवाब देते। आश्रम के पौधों को पानी पिलाते और आश्रम में आने वाले अतिथियों को भोजन कराते। बर्तन माँजते समय नैनीताल की पथरीली मिट्टी से हाथ में चीरे पड़ जाते थे तो वे हाथ में कपड़ा बाँध कर बर्तन माँजते। उनकी यह दशा देखकर लोगों को उन पर दया आती थी लेकिन यह सब कष्ट सहन करते हुए जब उन पर सदगुरू की कृपा बरसी और उन्होंने गुरुकृपा पचायी तो साधक में से सिद्ध बन गये, आसुमल से आसाराम बन गये और प्राचीनकाल से ही हमारे भारत में चली आ रही गुरु-शिष्य परंपरा में गुरु-शिष्य की एक और महान कड़ी जुड़ गयी।

 ✍🏻सीखः सदगुरु की सेवा में चाहे कितने भी कष्ट सहने न पड़ें, वे अंततः कल्याणकारी और सब दुःखों से छुड़ाने वाले होते हैं।

ऐसे दुःख को सहन करने वाला संसार के सब कष्टों से छूट जाता है। इसलिए हमें सदैव सदगुरु की सेवा में तत्पर रहना चाहिए। 

 🙌🏼संकल्पः "गुरुसेवा में चाहे कितने ही कष्ट सहने पड़ें। 
हम गुरुसेवा में सदैव तत्परतापूर्वक लगे रहें।।"
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