सच्चा हीरा
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सच्चा हीरा

संध्या का समय था । गाँव की चार स्त्रियाँ पानी भरने के लिए अपने-अपने घड़े लेकर कुएँ पर पहुँचीं । पानीभरने के साथ-साथ वे आपस में बातें भी कर रही थीं । 

उनमें से एक ने कहा : ‘‘मैं अपने बेटे से बहुत खुश हूँ ।
 भगवान अगर किसीको बेटा दे तो ऐसा ही दे। बेटा क्या, अनमोल हीरा है हीरा ! उसका कंठ इतना मधुर है कि बस पूछो मत...!!! 

उसकी बात सुनकर दूसरी ने भी बड़े गर्व के साथ कहा : 
‘‘मेरा बेटा भी ऐसा ही है। मल्लविद्या में तो वह इतना निपुण है कि उसकी बराबरी बड़े-बड़े पहलवान भी नहीं कर पाते हैं । 

तीसरी ने कहना शुरू किया : ‘‘मेरा बेटा भी हीरे से कम नहीं है । उसके कण्ठ में सरस्वती का निवास है। वह ज्ञान का विपुल भंडार है । जो एक बार पढ़ लेता है उसे कभी भूलता नहीं है।


चौथी स्त्री बिल्कुल चुप बैठी हुई थी। उसे देखकर एक ने कहा : ‘‘बहन ! भगवान ने तुम्हें भी बेटा दिया है।
तुम भी उसके बारे में कुछ बताओ। क्या उसमें कोई भी गुण नहीं है ?
उसने कहा : ‘‘नहीं-नहीं, ऐसी बात नहीं है। मेरा बेटा तुम्हारे बेटोंं की तरह न गंधर्व है, न पहलवान और न ही बृहस्पति। वह तो बहुत ही सीधा-सादा, सरल हृदय का है। वह माता-पिता व गुरुजनों की सेवा को ही अपना प्रथम कर्तव्य मानता है। 

जब चारों स्त्रियाँ अपने-अपने घड़े उठाकर सिर पर रखनें लगीं,उसी समय पास से किसी के गीत की मधुर ध्वनि सुनायी दी।

पहली स्त्री ने कहा :"मेरा हीरा आ रहा है। कितना मधुर गाता है। 

तभी दूसरी स्त्री का बेटा उधर आया । वह सचमुच भीम जैसा लग रहा था । उसकी छाती चौड़ी व भुजाएँ कसी हुई थीं । वह भी बिना अपनी माँ की ओर देखे वहाँ से निकल गया ।

तीसरी स्त्री का लड़का फर्राटे-से संस्कृत के श्लोक और विद्वत्तापूर्ण कविताओं का पाठ करते हुए वहाँ से
गुजरा ।

तभी चौथी स्त्री का बेटा भी उधर आ पहुँचा । वह अपनी माँ से बड़े स्नेह से कहने लगा : ‘‘ओ माँ ! तू क्यों तकलीफ उठाती है ? ला, अपना घड़ा मुझे दे, मैं इसे ले चलता हूँ ।" 

चौथी स्त्री ने बार-बार मना किया परंतु वह नहीं माना । उसने अपनी माँ के सिर से घड़े को उतारकर अपने सिर
पर रख लिया और आगे-आगे चलने लगा। सभी स्त्रियाँ उसके व्यवहार को देखकर आश्चर्यचकित हो गयीं । 

कुछ दूर बैठे एक वृद्ध पुरुष के मुख से सहज में ही शब्द फूट निकले : ‘‘धन्य-धन्य ! यही है सच्चा हीरा जो अवसर मिलने पर अपनी माँ की सेवा से चूका नहीं।

 ✍🏻बहुत बड़ा विद्वान बन जाने से,
संगीतज्ञ,खिलाड़ी अथवा धनवान बन जाने से कोई बड़ा नहीं हो जाता ।कोई बहुत बड़े पद पर पहुँच गया लेकिन माँ-बाप व गुरुजनों की सेवा से जी चुराता है तो उसका बड़प्पन किस काम का ? कोई बड़े पद पर पहुँच गया उसने मिथ्या अहंकार और वासना को ही तो सजाया । परदुःखकातरता और कुटिलतारहित जीवन सत्-चित्-आनंदस्वरूप को पाने में सफल हो जाता है, अपनी सात पीढ़ियों का तारणहार बन जाता है । सच्चा बड़प्पन तो तब है जब हमारे सद्गुण सहज में सत्-चित्-आनंद की सुवास फैलायें, आत्मसुख का आनंद उभारें । हम मातृ-पितृ-गुरुभक्ति को अपने आचरण में लायें । 

 📝सीख : हम चाहे कितने भी बड़े आदमी क्यों न बन जायें पर माता-पिता के किये हुए उपकार नहीं भूलने चाहिए क्योंकि जीवन में हमें सब कुछ मिलेगा पर माता-पिता नहीं मिलेंगे । इसलिए हमें सदा अपने माता-पिता कि सेवा और आदर-सम्मान करना चाहिए।

 प्रश्नोत्तरी : (क) वृद्ध पुरुष ने किसे सच्चा हीरा कहा और क्यों ? 
 (ख) संस्कार किसे कहते हैं ?

✒गृहकार्य : अगले सप्ताह केन्द्र में आने तक आपको रोज अपने माता-पिता के कार्य में मदद करना है और रोज की गयी मदद अपनी नोटबुक में लिखकर लाना है । नोटबुक में अपने माता या पिता के हस्ताक्षर करवाकर लायें । साथ ही अगले सप्ताह होली आ रही है  अतः सबको अपने घर से रंग बनाकर लाने हैं । पता है कैसे बनाने हैं रंग ?
ये हम बाल संस्कार में सीखेंगे।
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