नारद मुनि ने दी बालक ध्रुव को दीक्षा
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नारद मुनि ने दी बालक ध्रुव को दीक्षा

पाँच वर्ष के ध्रुव को ईश्वर-प्राप्ति किनकी कृपा से हुई ?
सद्गुरु महिमा,गुरुमंत्र की महिमा का बखान करती हुई यह कहानी...

 राजा उत्तानपाद की दो रानियाँ थीं। प्रिय रानी का नाम सुऱूची और अप्रिय रानी का नाम सुमति था। दोनों रानियों को एक-एक पुत्र था। 

 एक बार रानी सुमति का पुत्र ध्रुव खेलता-खेलता अपने पिता की गोद में बैठ गया। रानी ने तुरंत ही उसे पिता की गोद से नीचे उतार कर कहाः
"पिता की गोद में बैठने के लिए पहले मेरी कोख से जन्म ले।"

 ध्रुव रोता-रोता अपना माँ के पास गया और सब बात माँ से कही। माँ ने ध्रुव को समझायाः बेटा! यह राजगद्दी तो नश्वर है परंतु तू भगवान का दर्शन करके शाश्वत गद्दी प्राप्त कर। ध्रुव को माँ की सीख बहुत अच्छी लगी और तुरंत ही दृढ़ निश्चय करके तप करने के लिए जंगल में चला गया।

रास्ते में हिंसक पशु मिले फिर भी भयभीत नहीं हुआ। इतने में उसे देवर्षि नारद मिले। ऐसे घनघोर जंगल में मात्र 5 वर्ष को बालक को देखकर नारद जी ने वहाँ आने का कारण पूछा। ध्रुव ने घर में हुई सब बातें नारद जी को बता दीं और भगवान को पाने की तीव्र इच्छा प्रकट की। 

नारद जी ने ध्रुव को समझायाः “तू इतना छोटा है और भयानक जंगल में ठण्डी-गर्मी सहन करके तपस्या नहीं कर सकता इसलिए तू घर वापस चला जा।“ परन्तु ध्रुव दृढ़निश्चयी था। उसकी दृढ़निष्ठा और भगवान को पाने की तीव्र इच्छा देखकर नारदजी ने ध्रुव को ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ’ का मंत्र देकर आशीर्वाद दियाः “ बेटा! तू श्रद्धा से इस मंत्र का जप करना। भगवान ज़रूर तुझ पर प्रसन्न होंगे।“ 

 ध्रुव तो कठोर तपस्या में लग गया। एक पैर पर खड़े होकर, ठंडी-गर्मी, बरसात सब सहन करते-करते नारदजी के द्वारा दिए हुए मंत्र का जप करने लगा। उसकी निर्भयता, दृढ़ता और कठोर तपस्या से भगवान नारायण स्वयं प्रकठ हो गये। 

भगवान ने ध्रुव से कहाः “ कुछ माँग, माँग बेटा! तुझे क्या चाहिए। मैं तेरी तपस्या से प्रसन्न हुआ हूँ। तुझे जो चाहिए वर माँग ले।“ ध्रुव भगवान को देखकर आनंदविभोर हो गया। भगवान को प्रणाम करके कहाः “हे भगवन्! मुझे दूसरा कुछ भी नहीं चाहिए। मुझे अपनी दृढ़ भक्ति दो।“ भगवान और अधिक प्रसन्न हो गए और बोलेः तथास्तु। मेरी भक्ति के साथ-साथ तुझे एक वरदान और भी देता हूँ कि आकाश में एक तारा ‘ध्रुव’ तारा के नाम से जाना जाएगा और दुनिया दृढ़ निश्चय के लिए तुझे सदा याद करेगी।“ 

आज भी आकाश में हमें यह तारा देखने को मिलता है। ऐसा था बालक ध्रुव, ऐसी थी भक्ति में उसकी दृढ़ निष्ठा। पाँच वर्ष के ध्रुव को भगवान मिल सकते हैं तो हमें भी क्यों नहीं मिल सकते? ज़रूरत है भक्ति में निष्ठा की और दृढ़ विश्वास की।

 ✍🏻सीख : सद्गुरु द्वारा प्राप्त मंत्र से,भक्ति,निष्ठा व दृढ़ विश्वास से हम भी भगवान को प्रकट कर सकते हैं।

✒नारद मुनि ने ध्रुव को कौनसा मंत्र दिया था जिसके जपने से भगवान प्रकट हुए ???

 🙌🏻संकल्प : हम भी हर रोज निष्ठापूर्वक प्रेम से मंत्र का जप करेंगे
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