स्वधर्मे निधनं श्रेयः
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स्वधर्मे निधनं श्रेयः

प्रत्येक मनुष्य को अपने धर्म के प्रति श्रद्धा एवं आदर होना चाहिए।

 भगवान 🔆श्रीकृष्ण ने भी कहा हैः

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठतात्।🔅
🔅 स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मों भयावहः।।

"अच्छी प्रकार आचरण किये हुए दूसरे के धर्म के गुणरहित भी अपना धर्म अति उत्तम है। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है।"
(गीताः 3.35)📖📚

जब भारत पर मुगलों का शासन था, तब की यह घटित घटना हैः
चौदह वर्षीय हकीकत राय विद्यालय में पढ़ने वाला सिंधी बालक था। एक दिन कुछ बच्चों ने मिलकर हकीकत राय को गालियाँ दीं। पहले तो वह चुप रहा। वैसे भी सहनशीलता तो हिन्दुओं का गुण है ही..... किन्तु जब उन उद्दण्ड बच्चों ने गुरूओं के नाम की और झूलेलाल व गुरू नानक के नाम की गालियाँ देना शुरू किया तब उस वीर बालक से अपने गुरू और धर्म का अपमान सहा नहीं गया।
हकीकत राय ने कहाः "अब हद हो गयी ! अपने लिये तो मैंने सहनशक्ति का उपयोग किया लेकिन मेरे धर्म, गुरू और भगवान के लिए एक भी शब्द बोलोगे तो यह मेरी सहनशक्ति से बाहर की बात है। मेरे पास भी जुबान है। मैं भी तुम्हें बोल सकता हूँ।"

उद्दण्ड बच्चों ने कहाः "बोलकर तो दिखा ! हम तेरी खबर लेंगे।" 

हकीकत राय ने भी उनको दो चार कटु शब्द सुना दिये। बस, उन्हीं दो चार शब्दों को सुनकर मुल्ला मौलवियों का खून उबल पड़ा। वे हकीकत राय को ठीक करने का मौका ढूँढने लगे। सब लोग एक तरफ और हकीकतराय अकेला एक तरफ।*
उस समय मुगलों का ही शासन था इसलिए हकीकत राय को जेल में कैद कर दिया गया।
मुगल शासकों की ओर से हकीकत राय को यह फरमान भेजा गया किः "अगर तुम कलमा पढ़ लो और मुसलमान बन जाओ तो तुम्हें अभी माफ कर दिया जायेगा और यदि तुम मुसलमान नहीं बनोगे तो तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर दिया जायेगा।"
हकीकत राय के माता-पिता जेल के बाहर आँसू बहा रहे थे किः "बेटा ! तू मुसलमान बन जा। कम-से-कम हम तुम्हें जीवित तो देख सकेंगे !" ....लेकिन उस बुद्धिमान सिंधी बालक ने कहाः
"क्या मुसलमान बन जाने के बाद मेरी मृत्यु नहीं होगी ?"
माता-पिताः "मृत्यु तो होगी।"

हकीकत रायः "तो फिर मैं अपने धर्म में मरना पसंद करूँगा। मैं जीते-जीते जी दूसरों के धर्म में नहीं जाऊँगा।"
क्रूर शासकों ने हकीकत राय की दृढ़ता देखकर अनेकों धमकियाँ दीं लेकिन उस बहादुर किशोर पर उनकी धमकियों का जोर न चल सका। उसके दृढ़ निश्चय को पूरा राज्य-शासन भी न डिगा सका।
अंत में मुगल शासक ने उसे प्रलोभन देकर अपनी ओर खींचना चाहा लेकिन वह बुद्धिमान व वीर किशोर प्रलोभनों में भी नहीं फँसा।
आखिर क्रूर मुसलमान शासकों ने आदेश दिया किः "अमुक दिन बीच मैदान में हकीकत राय का शिरोच्छेद किया जायगा।"
उस वीर हकीकत राय ने गुरू का मंत्र ले रखा था। गुरूमंत्र जपते-जपते उसकी बुद्धि सूक्ष्म हो गयी थी। वह चौदह वर्षीय किशोर जल्लाद के हाथ में चमचमाती हुई तलवार देखकर जरा भी भयभीत न हुआ वरन् वह अपने गुरू के दिये हुए ज्ञान को याद करने लगा किः "यह तलवार किसको मारेगी ? मार-मारकर इस पंचभौतिक शरीर को ही तो मारेगी और ऐसे पंचभौतिक शरीर तो कई बार मिले और कई बार मर गये। ....तो क्या यह तलवार मुझे मारेगी ? नहीं। मैं तो अमर आत्मा हूँ.... परमात्मा का सनातन अंश हूँ। मुझे यह कैसे मार सकती है ? ॐ....ॐ.....ॐ......."

हकीकत राय गुरू के इस ज्ञान का चिंतन कर रहा था, तभी क्रूर काजियों ने जल्लाद को तलवार चलाने का आदेश दिया। जल्लाद ने तलवार उठायी लेकिन उस निर्दोष बालक को देखकर उसकी अंतरात्मा थरथरा उठी। उसके हाथों से तलवार गिर पड़ी और हाथ काँपने लगे।

काजी बोलेः "तुझे नौकरी करनी है कि नहीं ? यह तू क्या कर रहा है ?"
तब हकीकत राय ने अपने हाथों से तलवार उठायी और जल्लाद के हाथ में थमा दी। फिर वह किशोर हकीकत राय आँखें बंद करके परमात्मा का चिंतन करने लगाः "हे अकाल पुरूष ! जैसे सांप केंचुली का त्याग करता है वैसे ही मैं यह नश्वर देह छोड़ रहा हूँ। मुझे तेरे चरणों की प्रीति देना ताकि मैं तेरे चरणों में पहुँच जाऊँ.... फिर से मुझे वासना का पुतला बनकर इधर-उधर न भटकना पड़े.....अब तू मुझे अपनी ही शरण में रखना.... मैं तेरा हूँ..... तू मेरा है.....हे मेरे अकाल पुरूष !"

इतने में जल्लाद ने तलवार चलायी और हकीकत राय का सिर धड़ से अलग हो गया।
हकीकत राय ने 14 वर्ष की नन्हीं सी उम्र में धर्म के लिए अपनी कुर्बानी दे दी। उसने शरीर छोड़ दिया लेकिन धर्म न छोड़ा।

⚜ गुरूतेगबहादुर बोलिया, सुनो सिखों ! बड़भागिया, ⚜
धड़ दीजे धरम न छोड़िये....

हकीकत राय ने अपने जीवन में यह चरितार्थ करके दिखा दिया।
हकीकत राय तो धर्म के लिए बलिवेदी पर चढ़ गया लेकिन उसकी कुर्बानी ने सिंधी समाज के हजारों लाखों जवानों में एक जोश भर दिया किः

"धर्म की खातिर प्राण देना पड़े तो देंगे लेकिन विधर्मियों के आगे कभी नहीं झुकेंगे। भले अपने धर्म में भूखे मरना पड़े तो स्वीकार है लेकिन परधर्म को कभी स्वीकार नहीं करेंगे।"
ऐसे वीरों के बलिदान के फलस्वरूप ही हमें आजादी प्राप्त हुई है और ऐसे लाखों-लाखों प्राणों की आहुति द्वारा प्राप्त की गयी इस आजादी को हम कहीं व्यसन, फैशन एवं चलचित्रों से प्रभावित होकर गँवा न दें ! अब देशवासियों को सावधान रहना होगा।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
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