उन्नति की उडान
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उन्नति की उडान

तमिलनाडु में एक कन्या का जन्म हुआ । उसके माता-पिता बचपन में ही चल बसे । जिस दम्पति ने उसका पालन-पोषण किया उसने उसका नाम रखा अय्यवार ।

अय्यवार पढ़ने में तो होशियार थी ही,कविताएँ भी बना लेती थी । जब वह 16 वर्ष की हुई तब उस दम्पति ने उसे विवाह करने के लिए कहा ।
अय्यवार ने कहा : ‘‘मुझे हाड़-माँस के शरीर से शादी करके अपना जीवन भोगी नहीं बनाना है। मुझे तो परमेश्वर की भक्ति करके परमेश्वर को ही पाना है ।

अय्यवार के मना करने पर भी वे उसकी शादी की तैयारियाँ करने लगे । रोज रात्रि को कन्या भगवान को पुकारती कि ‘मेरा सौंदर्य और जवानी मुझे संसार में घसीट रही है । भगवान ! ऐसा सौंदर्य किस काम का जो मुझे संसार की वासनाओं में घसीट ले जाय ? फिर बुढ़ापे में आहें भरती-भरती अंत में श्मशान की यात्रा करूँ किंतु तेरे द्वार तक न पहुँच पाऊँ ? हे भगवान ! मैं तेरी बालिका हूँ... तेरी शरण में हूँ... तू कुछ भी करके मेरा सौंदर्य और जवानी छीन ले और अपनी भक्ति का दान दे दे।

एक रात्रि को वह कन्या खूब रो-रोकर कातरभाव से प्रार्थना करते-करते सो गयी । सुबह उठी तो उसका सौंदर्य गायब था और वह अधेड़ उम्र की लगने लगी ! उसके पालनकर्ता माता-पिता को आश्चर्य हुआ कि ‘यह कैसे हो गया ? अब इस कन्या से कौन शादी करेगा ?
तब अय्यवार ने सारी बात बताते हुए कहा : ‘‘मैंने ही भगवान से मेरी जवानी और सौंदर्य छीन लेने के लिए प्रार्थना की थी और कहा था कि तू मुझे ऐसा बना दे कि मुझे कोई पसंद न करे, ताकि मैं संसार की दलदल में न गिरूँ।

जब कुटुम्बियों ने अय्यवार से उसकी प्रार्थना स्वीकार किये जाने की बात सुनी और उसकी भगवत्प्राप्ति की तीव्र इच्छा को जाना,तब उनके हृदय में भी अय्यवार के लिए श्रद्धा जाग उठी और वे बोले : ‘‘16 साल की कन्या 40 साल की दिखने लगी ! रातोंरात सौंदर्य गायब ! रातोंरात यौवन गायब ! यह किसी साधारण व्यक्ति का काम नहीं है । विश्वनियंता ने ही तेरी प्रार्थना स्वीकार की है और तुझे ऐसा रूप दे दिया है । अतः अब हमने भी तेरी शादी
का विचार बदल दिया है । अब तू खूब भजन कर और ईश्वर के रास्ते पर चल ।
 
अब अय्यवार का पूरा समय भगवद्भक्ति में बीतने लगा । लोग उसे भक्त अय्यवार के नाम से जानने लगे ।
भगवन्नाम का वैखरी से जप करते-करते वह मध्यमा में पहुँच गयी, फिर क्रमशः पश्यंति और परा में ।
दूसरा सुन सके उस आवाज में बोलना ‘वैखरी वाणी कहलाता है । होंठ और जीभ हिलती रहे किंतु किसीको पता न चले कि हम क्या बोल रहे हैं, इसे ‘मध्यमा वाणी' कहते हैं ।
 न होंठ हिलें न जीभ, फिर भी हमें पता चले कि जप हो रहा है, इसे ‘पश्यंति वाणी बोलते हैं । इसके आगे की वाणी ‘परा वाणी  ।
उसमें सत्यसंकल्प-सिद्धि आ गयी । वह किसीके लिए शुभ सोच लेती तो उसका शुभ हो जाता । किसीके लिए शुभकामना करती या संकल्प करके कोई चीज दे देती तो उसको सुख-शांति मिलती । 

उसने कई कविताओं की रचना की और तमिल में एक ग्रंथ भी लिखा - नीतिवारी विलोरवम् । उस ग्रंथ में आता है :
‘शरीर पानी का एक बुलबुला है । कब फूट जाय कोई पता नहीं और यह धन-वैभव समुद्र की लहरों जैसा है ।
जैसे समुद्र में लहरें कभी कहीं तो कभी कहीं जाती हैं, वैसे ही इस जीवन में कोई स्थिरता या सार नहीं है । बुलबुलों
तथा लहरों जैसे क्षणिक व अस्थिर धन और जीवन को यदि तुच्छ तू-तू, मैं-मैं में खपा दिया तो तुने कुछ नहीं
किया । अगर ऐसे निस्सार जीवन में तुने ईश्वर को पा लिया तो यह तुम्हारी बुद्धिमानी है, तुम्हारा सौभाग्य है ।

अय्यवार के वचन सुनकर लोग प्रभावित होने लगे । अय्यवार स्वयं तो उन्नत हुई ही, उसने अपने जमाने की कई युवतियों, महिलाओं और माताओं के जीवन को उन्नत बनाने में भी योगदान दिया ।
धन्य है अय्यवार की सूझबूझ ! संसारी विषय, विकारी सुख शुरू में अच्छे लगते हैं लेकिन बाद में चौरासी लाख योनियों में भटकाते हैं । ईश्वर का रास्ता शुरू में जरा कठिन लगता है लेकिन अंत में ईश्वरीय सुख से सराबोर कर देता है ।

अय्यवार की सूझबूझ एवं विवेक-वैराग्य को जो देवियाँ समझ पायेंगी, वे भी
सत्यस्वरूप ईश्वर के रास्ते
सफल हो जायेंगी ।

📚बाल संस्कार केन्द्र पाठ्यक्रम
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