कैसा हो प्रजापालक
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कैसा हो प्रजापालक

प्रजापालक यदि न्यायप्रिय, उदार तथा प्रजा का भला चाहनेवाला होता है तो सारी प्रजा के हृदय में उसके लिए बड़ा आदर एवं ऊँचा स्थान हो जाता है । इतना ही नहीं, उसके वंशजों को भी सम्मान प्राप्त होता है । इसीका प्रत्यक्ष उदाहरण है यह घटित घटना ।
भावनगर राज्य की गद्दी पर जब कृष्णकुमार सिंहजी थे, तब एक बार राज्य में भयंकर अकाल जैसी स्थिति पैदा हो गयी थी । लोगों के कष्ट दूर करने के लिए राज्य की ओर से राशन की दुकानें खोली गयी थीं परंतु महुआ के पास एक गाँव में एक नया ही प्रसंग दिखा ।

 उस गाँव के सभी किसानों के कुएँ सूख गये थे पर उनमें एक किसान का कुआँ नहीं सूखा था। वह किसान भगवद्भक्त,सज्जन व्यक्ति था । गाँव के लोग भी उस कुएँ से पानी का उपयोग करते थे । किसान के घर के बूढ़े-बालक सभी ने खून-पसीना एक करके ढाई बीघे खेत में ज्वार बोयी । खेती पकी और देखते-ही-देखते खेत में ज्वार के दो ढेर लग गये । किसान भाव में भरकर भगवान को धन्यवाद दे रहा था : ‘हे प्रभु ! आपकी कृपा से अब बच्चे भूखों नहीं मरेंगे ।’

तभी सामने से एक घोड़ागाड़ी आती दिखी । उसमें से एक थानेदार रोबदाब के साथ गाड़ी से उतरा और बोला : ‘‘यह ज्वार तेरी है ?’’

किसान : ‘‘जी साहब ! भगवान की कृपा से कुएँ में पानी था, इससे यह ज्वार हो गयी ।’’

‘‘आधी ज्वार तुझे राज्य को देनी पड़ेगी ।’’

‘‘साहब ! इस ज्वार से तो अगली फसल तक मेरे बच्चों का भी काम नहीं चलेगा, फिर मैं इसे कैसे दे सकूँगा ?’’

‘‘अरे, तू तो बड़ा मुँहफट मालूम होता है । कल मैं गाड़ी भेजूँगा । उसमें यदि ज्वार नहीं भरी तो फिर तेरे को जेल के सीकचों में ढकेलना पड़ेगा ।’’ ऐसा कहकर थानेदार चला गया ।

किसान के ऊपर मानो गाज गिर गयी । वह भगवान को कातर भाव से पुकारने लगा । उसकी पुकार भगवान ने सुनी । किसान की पत्नी को भगवत्प्रेरणा हुई । वह हिम्मत बँधाते हुए बोली : ‘‘राजा साहब गोपनाथ के बँगले पर हवा खाने आये हुए हैं । जाइये, उनको यह सब बताइये । भगवान की कृपा से राजा साहब इस थानेदार के जुल्म से मुक्त करेंगे ।’’

जैसे बुझते दीपक में तेल पड़ गया हो, वैसे ही किसान की आँखों में चमक आ गयी । संध्या होते ही वह राजा साहब के पास अँधेरे में ही चल दिया और पौ फटते-फटते बँगले पर पहुँच गया।

सूरज उगा,राजा साहब घूमने निकले । किसान साहस करके उनके पास गया पर कुछ बोल न सका । आँखों से आँसुओं की धाराएँ बह चलीं और वह राजा के पैरों पर पड़ गया ।

श्रीकृष्णकुमार सिंहजी ने किसान को उठाया और खूब सांत्वना देकर किसान से सारी बात पूछ ली । थानेदार का अत्याचार सुनते ही राजा साहब की आँखें लाल हो गयीं । उन्होंने उसी समय उस थानेदार की बरखास्तगी का आदेश लिख दिया और राज्य के दो आदमियों को अपनी मोटर देकर उस किसान के साथ भेजा।

थानेदार गाड़ी भेजे इसके पहले ही उसकी नौकरी से छुट्टी हो गयी । गरीब किसान के बच्चों को रोटी मिली । सारे गाँव से अधिकारियों का अन्याय दूर हो गया । राजा के प्रति गाँव के लोगों की श्रद्धा इतनी बढ़ गयी कि केवल श्रीकृष्णकुमार सिंहजी ही नहीं, उनके वंश में आनेवाली संतानों का भी उस गाँव में स्वागत किया जाता रहा।

📚लोक कल्याण सेतु/अगस्त २०१५/२१८/१७
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