रामजी की चिड़िया रामजी का खेत
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रामजी की चिड़िया रामजी का खेत

एक बार संत तुकाराम जी ने किसी की साझेदारी में खेत रखा था। फसल बोकर वे खेत की रखवाली कर रहे थे,तब उन्हें निश्चिंतता से बैठे देखकर किसी ने कहा :"आपके खेत के सारे दाने तो पक्षी चुग रहे हैं ?"
यह सुनकर तुकारामजी ने कहा :
"रामजी की चिड़िया रामजी का खेत"

जिस व्यक्ति की साझेदारी में खेत था उस व्यक्ति को इस बात का पता चलते ही वह चिढ़ गया और सोचने लगा कि इस प्रकार पक्षी को खिला देने से 32 मन तो क्या,मनभर दाने भी हमारे हिस्से में नहीं आएंगे। अतः वह सरपंच के पास गया और बोला :"आप तुकाराम जी को दूसरा खेत दिलवा दीजिए और उसके पास से मेरा खेत मुझे वापस दिलवा दीजिए क्योंकि वह तो सारा दिन "विट्ठल... विट्ठल.. ही जपता रहता है और खेत में तनिक भी ध्यान नहीं देता।
 सरपंच :" लेकिन तुकाराम ने खेत में फसल बो दिया है इसीलिए उसके साथ में ऐसा व्यवहार नहीं कर सकता । फिर भी मैं जाकर उसे समझाता हूँ कि वह खेत की देख-रेख अच्छी तरह से करे।" 

बाद में सरपंच ने जाकर तुकाराम से कहा :" तुम सारा दिन "रामजी की चिड़िया रामजी का खेत" करके सब दाने पक्षियों को खिला देते हो तो फिर तुम्हारे दूसरे साझीदार को क्या दोगे ?"

 तुकारामजी :"मैं कम दाने लेकर उन्हें ज्यादा हिस्सा दूँगा।"

 सरपंच :"लेकिन पक्षी सब दाने चुग जाएंगे तो फसल कैसे होगी और बिना अनाज पके तुम क्या दे सकोगे ?"

 तुकारामजी :"दूसरे हिस्सेदार जितने दाने देते हैं उतने ही दाने मैं भी दूँगा।"

 तब सरपंच ने किसान से पूछा :"दूसरे साझीदार तुम्हें कितने दाने देते थे?"

 किसान : "32 मन"

 तुकारामजी :"मैं इन्हें 33 मन दाने  दूँगा।"

 सरपंच :"ऐसा कैसे हो सकता है ?"

 तुकारामजी :"वह तो मेरा राम ही जाने जो पूरे ब्रह्मांड को सत्ता दे रहा है।"

जब फसल के बँटवारे का समय आया तब 32 की जगह 33 मन दाने तुकारामजी ने उस किसान को दे दिए फिर उनके अपने हिस्से में 35 मन दाने और बच गए क्योंकि तुकाराम जी ने सच्चे हृदय से भगवान की भक्ति की थी।
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