दिव्य गुरुभक्ति
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दिव्य गुरुभक्ति

आत्मज्ञानी, आत्म-साक्षात्कारी महापुरुष को जिसने गुरु के रुप में स्वीकार कर लिया हो उसके सौभाग्य का क्या वर्णन किया जाय ?

भगवान कपिल मुनि जैसे ब्रह्मज्ञानी महापुरुष ने सदाचारी, संयमी एवं सात्त्विकता की मूर्ति माता देवहूति की कोख से अवतरित होकर उन्हें महानता प्रदान की और माता देवहूति ने भी भगवत्प्राप्ति के लिए अपने आत्मज्ञानी पुत्र को गुरुपद पर आसीन करके ब्रह्मविद्या पाने का पुरुषार्थ किया था। 

इसका पुनरावर्तन इस कलियुग में भी देखने को मिला पूजनीया अम्मा के जीवन में। इस देवी ने पूज्य बापू जी को अपनी कोख से अवतरित कर जगज्जननी पद को विभूषित किया, साथ ही अपने ही ब्रह्मज्ञानी तत्त्ववेत्ता पुत्र को गुरुपद पर प्रतिष्ठित करके गुरु-शिष्य परम्परा को एक अनोखा गौरव भी प्रदान किया।

अम्मा  के जीवन में गुरुनिष्ठा, गुरुभक्ति और गुरुश्रद्धा कितनी प्रबल थी इससे संबंधित अम्मा के जीवन के अनेक प्रसंग सभी गुरुभक्तों के लिए प्रेरणादायी सिद्ध होंगे।
जब-जब अम्माजी को गुरुदेव का विरह असह्य हो उठता, गुरुदर्शन की तीव्रता पराकाष्ठा पर पहुँच जाती तब-तब अम्मा गुरुदेव की याद में मूर्च्छित हो जातीं। 

जब आश्रम में शिविर अथवा उत्सव का वातावरण होता तब अम्मा के दर्शन हेतु आने वाले भी बहुत होते। पूज्यश्री जैसी महान विभूति को जिन्होंने जन्म दिया ऐसी पूजनीया अम्मा के दर्शन की लालसा किसे नहीं होगी,फिर चाहे वर भारतवासी हो या विदेशी। 

ऐसी परिस्थितियों में उन्हें साधना के नियम को पूरा करने के लिए सत्साहित्य विभाग के कक्ष में चले जाना पड़ता। लोकैषणा अथवा वाहवाही से दूर रहने वाली अम्मा के लिए गुरुआज्ञा ही सर्वोपरि थी।
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