भगवान ही याद रहें
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भगवान ही याद रहें

वे महापुरुष कितने विलक्षण होते हैं कि तुच्छ संसारी बात को भी भगवान की ओर मोड़ देते हैं !

ब्रह्मलीन संत करपात्रीजी महाराज सन् 1981 में कुछ अस्वस्थ हो गये थे । महाराजश्री ने अपने एक भक्त से कहा : ‘‘मुझे श्री भगवान की कथा सुनाओ।

भक्त बोला : ‘‘आपकी अस्वस्थता के कारण वैद्यजी ने कुछ भी सुनाने को मना कर दिया है ।"

महाराज बोले : ‘‘श्री भगवान की कथा ही तो यथार्थ में मनुष्य को स्वस्थ बनाती है । ‘गजेन्द्रमोक्ष' ही सुनाओ । भक्त ने वहाँ उपस्थित पुरी के शंकराचार्यजी से अनुमति लेकर उन्हें ‘गजेन्द्रमोक्ष स्तोत्र' सुनाया ।                                                                                                                       

एक अन्य भक्त से महाराज ने कहा : ‘‘तुम्हें कोई स्तोत्र स्मरण हो तो सुनाओ ।
उसने भी वैद्य की सूचना दोहराते हुए पूर्ण विश्राम की प्रार्थना की ।                                                                                                                    एक अन्य सज्जन बोले : ‘‘वैद्यजी ने तो यहाँ तक कहा है कि जप आदि भी महाराज को अभी नहीं करने देना चाहिए ।
महाराज आश्चर्य प्रकट करते हुए किंचित् हास्य मुद्रा में बोले : ‘‘अच्छा ! तब तो वैद्यजी से कहो कि वे कोई दूसरा रोगी ढूँढें ।

इतने में शंकराचार्यजी पर महाराज की दृष्टि गयी,                                                                                                                                                 उनसे बोले : ‘‘मुझे कौन-सी कथा सुननी चाहिए,भगवान की कथा या लोक-कथा ?

वे बोले : ‘‘आपके लिए तो भगवद्कथा सर्वोत्तम है ।

महाराज बोले : ‘‘यही तो मैं भी कहता हूँ । फिर रोकते क्यों हो ?

शंकराचार्यजी ने कहा : ‘‘महाराज ! आप तो स्वयं ज्ञातज्ञेय, प्राप्त-प्राप्तव्य और कृतकृत्य हैं। आपका वाचिक व मानस जप स्वतः निरंतर चल रहा है। अभी अन्य श्रम नहीं करना चाहिए।

महाराज भी भावविभोर हो गये और कहने लगे : ‘‘ठीक कहते हो । यह संसार श्रम ही तो है - ‘श्रम एव हि केवलम' भगवान की कथा और चिंतन छोडकर शेष सब श्रममात्र ही तो है।
‘‘महाराजजी ! चिकित्सकों की राय में आपको पूर्ण विश्राम करना चाहिए । 
‘‘विश्राम तो भगवद्चिंतन एवं भगवान की कथा में ही है। शेष तो सब श्रम-ही-श्रम है। 
सनकादि मुनि अखंड बोधरूप समाधि को छोडकर भी कथा सुनते हैं। श्रीमद्भागवत,श्रीमद्वाल्मीकि रामायण, विष्णुसहस्रनाम - ये हमारे प्राण हैं, अतः इन्हें निरंतर हमें सुनाते रहो।                                                                                                                                     

एक भक्त ने कहा : ‘‘महाराजजी ! आपको लेटे ही रहना चाहिए।
महाराज बोले : ‘‘अनादिकाल से जीव सोता पड़ा रहा है। उसे तो वस्तुतः अब जागने की आवश्यकता है ।                                                                         एक अन्य सज्जन ने कहा : ‘‘महाराजजी ! आपको बैठे हुए बहुत देर हो गयी, इससे थकावट आ जायेगी ।
महाराजजी बोले : ‘‘हाँ भैया ! यह जीव अनंतकाल से बैठा है । अब तो इसे कुछ सत्कर्म करना ही चाहिए ।
किसीने कहा : ‘‘महाराजश्री ! वैद्यजी ने आपके लिए बहुत अच्छा धातु-पाक (औषधि विशेष) बनाकर दिया है ।
महाराज ने उत्तर दिया : ‘‘वैद्यजी से बोलो, ऐसी औषधि दें जिससे यह संसार हम भूल जायें और केवल भगवान का ही स्मरण होता रहे ।

✍🏻सीख : संसारी व्यक्ति भगवान की बात सुनकर भी सांसारिक चिंतन से उपराम नहीं होता लेकिन वे महापुरुष कितने विलक्षण होते हैं कि तुच्छ संसारी बात को भी भगवान की ओर मोड़ देते हैं !

प्रश्नोत्तरी : संत-महापुरुष कैसे हर बात को भगवान की ओर मोड़ देते हैं ?
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