सर्प में भी भगवद्बुद्धि की प्रेरणा - नागपंचमी
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सर्प में भी भगवद्बुद्धि की प्रेरणा - नागपंचमी

सिंधी जगत में एक कथा प्रचलित है : किसी निर्धन कन्या को धन प्राप्ति की खूब लालसा थी। एक दिन उसे स्वप्न में सर्पदेवता के दर्शन हुए और उन्होंने कहा : "फलानी जगह पर धन गड़ा हुआ है,तू वहाँ आकर ले जा। मुझे कोई बहन नहीं है और तुझे कोई भाई नहीं है तो आज से तू मेरी बहन और मैं तेरा भाई।"

सर्पदेवता द्वारा बताई गई जगह पर उसे बहुत धन मिला और वह खूब धनवान हो गई फिर तो वह प्रतिदिन अपने सर्प भाई के पीने के लिए दूध रखती। सर्पदेवता आकर दूध में पहले अपनी पूँछ डालते और बाद में दूध पीते। एक दिन जल्दबाजी में बहन ने दूध ठंडा किए बिना ही रख दिया।

सर्प ने आकर ज्यों ही पूँछ डाली तो गर्म दूध से उसकी पूँछ जल गई । सर्प को विचार आया कि "मैंने बहन को इतना धन दिया किंतु वह दूध का कटोरा भी ठीक से नहीं देती है । अब उसे सीख देनी पड़ेगी।"

बहन सावन महीने में अपने कुटुंबियों के साथ कोई खेल खेल रही थी। सर्प को हुआ कि 'इसके पति को यमपुरी पहुँचा दूँ तो इसे पता चले कि लापरवाही का बदला कैसे होता है।"
सर्पदेवता उसके पति के जूतों के करीब छुप गए । 

इतने में तो खेल-खेल में कुछ भूल हो गई। किसी बहन ने कहा :"यहाँ चार आने नहीं रखे थे।"
 सर्प की बहन ने कहा : सत्य कहती हूँ कि यहीं रखे थे। मैं अपने प्यारे भाई सर्पदेवता की सौगंध खाकर कहती हूँ।"

 यह सुनकर सर्प को हुआ कि इसे मेरे लिए इतना प्रेम है!जिस तरह लोग भगवान अथवा देवता की सौगंध खाते हैं वैसे ही यह मेरी सौगंध खाती है!
 अतः वे प्रकट होकर बोले :" तूने तो भूल की थी पर मैं और भी बड़ी भूल करने जा रहा था लेकिन मेरे प्रति तेरा जो प्रेम है उसे देखते हुए मैं तुझे वरदान देता हूँ कि आज के दिन जो भी बहन मुझे याद करेगी उसका पति अकाल मृत्यु और सर्पदंश का शिकार नहीं होगा।"

तब से बहने आज के दिन व्रत तथा नागदेवता का पूजन करती हैं। नागपंचमी मनाने का कारण चाहे जो भी हो किंतु यह बात तो निश्चित है कि हमारी संस्कृति हिंसक प्राणियों के प्रति भी वैरवृति न रखने की, उनके प्रति सद्भाव जगाने की और उन्हें अभयदान देने की ओर संकेत करती है । 

नागों को दूध पिलाने की और उनमें भी परमात्मा को निहारने की दृष्टि देना,यह सनातन धर्म की विशेषता है।

📚ऋषि प्रसाद : अगस्त २००९ /१३
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