गुरुदीक्षा का विशेष महत्त्व क्यों
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गुरुदीक्षा का विशेष महत्त्व क्यों

ʹगुरुदेव की दीक्षा के प्रभाव से सब कर्म सफल होते हैं। गुरुदेव की सम्प्राप्तिरूपी परम लाभ से अन्य सर्व लाभ मिलते हैं। जिसका गुरु नहीं है वह मूर्ख है।ʹ भगवान शिवजी

सदगुरु मंत्रदीक्षा के द्वारा साधक की सुषुप्त शक्तियों को जगाकर परम लक्ष्य का मार्ग प्रशस्त कर देते हैं। दीक्षा = दीक्षा + क्षा। ʹदीʹ अर्थात् जो दिया जाय या जो ईश्वरीय प्रसाद देने की योग्यता रखता है। पचाने वाले साधक की योग्यता तथा देने वाले सदगुरु का अनुग्रह – इन दोनों का जब मेल होता है, तब दीक्षा सम्पन्न होती है। सदगुरु मंत्रदीक्षा देते हैं तो साथ-साथ अपनी चैतन्य शक्ति भी शिष्य को देते हैं।

भगवान शिवजी पार्वती जी से कहते हैं-

गुरुमंत्रो मुखे यस्य तस्य सिद्धयन्ति नान्यथा।

दीक्षया सर्वकर्माणि सिद्धयन्ति गुरुपुत्रके।।

जिसके मुख में गुरुमंत्र है उसके सब कर्म सिद्ध होते हैं, दूसरे के नहीं। दीक्षा के कारण शिष्य के सर्व कार्य सिद्ध हो जाते हैं।ʹ

गुरु की कृपा व शिष्य की श्रद्धारूपी दो पवित्र धाराओं का संगम ही दीक्षा है।

सर्वं स्यात्सफलं कर्म गुरुदीक्षाप्रभावतः।

गुरुलाभात्सर्वलाभो गुरुहीनस्तु बालिशः।।

भगवान शिवजी पार्वती जी से कहते हैं- ʹगुरुदेव की दीक्षा के प्रभाव से सब कर्म सफल होते हैं। गुरुदेव की सम्प्राप्तिरूपी परम लाभ से अन्य सर्व लाभ मिलते हैं। जिसका गुरु नहीं वह मूर्ख है।ʹ

जिनके जीवन में गुरुदीक्षा नहीं है उनका जीवन निरर्थक है। इसलिए शिवजी आगे कहते हैं-

न जानन्ति परं तत्त्वं गुरुदीक्षापराङमुखाः।

भ्रान्ताः पशुसमा ह्येते स्वपरिज्ञानवर्जिताः।।

ʹगुरुदीक्षा से विमुख रहे हुए लोग भ्रांत हैं, अपने वास्तविक ज्ञान से रहित हैं। सचमुच, वे पशु के समान हैं। परम तत्त्व को वे नहीं जानते।ʹ

जब दीक्षा मंत्र बोलकर दी जाती है तो उसे ʹमांत्रिक दीक्षाʹ कहते हैं। सदगुरु से प्राप्त मंत्र को श्रद्धा-विश्वासपूर्वक जपने से कम समय में ही लक्ष्यप्राप्ति होती है। जब तक दीक्षा नहीं लेते तब तक लक्ष्यप्राप्ति का मार्ग रुका रहता है। शास्त्रों में दीक्षा के बिना का जीवन पशुतुल्य कहा गया है। अतः मानव-जीवन में सदगुरु की दीक्षा का विशेष महत्त्व है।

सारस्वत्य मंत्रदीक्षा से सफलता

पूज्य बापू जी मंत्रदीक्षा के समय विद्यार्थियों को सारस्वत्य मंत्र और अन्य दीक्षार्थियों को गुरुमंत्र की दीक्षा देते हैं। सारस्वत्य मंत्र के जप से बुद्धि कुशाग्र बनती है और विद्यार्थी मेधावी होता है। दीक्षा के समय सिखायी जाने वाली यौगिक युक्तियों से फेफड़े व हृदय मजबूत बनते हैं। रोगप्रतिकारक शक्ति व धारणाशक्ति बढ़ती है। ऐसे अनेक-अनेक फायदे होते हैं। सारस्वत्य मंत्र की दीक्षा लेकर लाखों विद्यार्थियों ने अपना भविष्य उज्जवल बनाया है।

सुषदस्त्वम्। हे मनुष्य ! तू महापुरुषों का सत्संग कर। (यजुर्वेदः 11.44)
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