गणेशशंकर विद्यार्थी का संस्कृति प्रेम
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गणेशशंकर विद्यार्थी का संस्कृति प्रेम

एक विद्यालय में जिसमें अधिकांश छात्र फैशनपरस्त दिखायी पड़ते थे,एक नए छात्र ने प्रवेश लिया । उस छात्र का परिधान धोती,कुर्ता व टोपी था।
विद्यालयों के छात्रोंके लिए ये सर्वथा नया दृश्य था।

कुछ उस पर हँसे,कुछ ने व्यंग्य किया :"तुम कैसे छात्र हो तुम्हे up-to-date रहना भी नहीं आता? कम से कम अपना पहनावा तो ऐसा बनाओ जिससे लोग इतना तो जान सकें कि तुम एक बड़े विद्यालय के छात्र हो।"
नया छात्र हँसा और बोला :
*"अगर परिधान पहनने से व्यक्तित्व ऊपर उठ जाता तो टाई और सूट पहनने वाला हर अंग्रेज महान विद्वान् होता। मुझे तो उनमें कोई विशेषता नहीं दिखती। रही शान घटाने की बात तो सात समुद्र पार से आनेवाले,ठंडे मुल्क के अंग्रेज भारतवर्ष जैसे गर्म देश में भी केवल इसलिए अपना परिधान नहीं बदल सकते कि I उनकी संस्कृति का अंग है तो मै भी अपनी संस्कृति को क्यों हेय होने दूँ ?*
मुझे अपने स्वयं के मान,प्रशंसा और प्रतिष्ठा से ज्यादा धर्म प्यारा है,संस्कृति प्यारी है। जिसे जो कहना हो कहे,मै अपनी संस्कृति का परित्याग नहीं कर सकता।"
ये धर्मप्रिय,संस्कृतिप्रिय छात्र थे महान देश भक्त गणेश शंकर विद्यार्थी,जिन्होंने देश की स्वाधीनता हेतु अपने प्राणों का भी बलिदान दे दिया । 
उनके बलिदान की
प्रतिक्रियास्वरूप महात्मा गाँधी ने घोषणा की : "हमें तो अब गणेश शंकर विद्यार्थी बनना चाहिए। वे मरे नहीं,अमर हो गए।मै भी उन्ही की तरह मरने का आकांक्षी हूँ ।"
गणेशशंकर विद्यार्थी ने अपने धर्म,संस्कृति,लक्ष्य और कर्तव्य के लिए सबकुछ अर्पण कर दिया। सद्गुणी एवम् सुसंस्कारी गणेश शंकर विद्यार्थी केवल कुटुंब का ही नहीं,अपितु देश का मस्तक ऊँचा करके भारतवासियों की प्रशंसा एवम् प्रेम के पात्र बन सके ।
*यह लेख आप विद्यार्थियों को पढ़ा सकें,समझा सके तो मेरे चित्त में बड़ी प्रसन्नता होगी और आपके द्वारा भारतीय संस्कृति की महान सेवा होगी ।"*
*-परम पूज्य संत श्री आशारामजी बापू*
*✍🏻लोक-कल्याण सेतू/जून-जुलाई २००५*

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