काली की वीरता
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काली की वीरता

राजस्थान (डूंगरपुर जिला, रास्तपाल गाँव) की १९४७ की घटना है : उस गाँव की १० वर्षीय कन्या काली अपने खेत से चारा सिर पर उठाकर आ रही थी । हाथ में हँसिया था । उसने देखा कि ‘ट्रक के पीछे हमारे स्कूल के मास्टर साहब बँधे हैं और घसीटे जा रहे हैं ।‘ काली का शौर्य उभरा, वह ट्रक के आगे जा खडी हुई और बोली :‘‘मेरे मास्टर को छोड दो। सिपाही : ‘‘ऐ छोकरी ! रास्ते से हट जा ।'' ‘‘नहीं हटूँगी । मेरे मास्टर साहब को क्यों घसीट रहे हो ?'' ‘‘मूर्ख लडकी ! गोली चला दूँगा ।''
सिपाहियों ने बंदूक सामने रखी । फिर भी उसने परवाह न की और मास्टर को जिस रस्सी के साथ बाँधा गया था उसको हँसिये से काट डाला ! सिपाहियों ने गोलियाँ बरसायीं । उस लडकी का शरीर तो मर गया लेकिन उसकी शूरता अभी भी याद की जाती है । मास्टर का नाम था सेंगाभाई । उसे क्यों घसीटा जा रहा था ? क्योंकि वह कहता था कि ‘इन वनवासियों की पढाई बंद मत करो और इन्हें जबरदस्ती अपने धर्म से च्युत मत करो।' अंग्रेजों ने देखा कि ‘यह हमारा विरोध करता है, सबको हमसे लोहा लेना सिखाता है तो उसको मरवा दो।' वे लोग गाँव के इस मास्टर की इस ढंग से मृत्यु करवाना चाहते थे कि पूरे डूंगरपुर जिले में दहशत फैल जाय ताकि कोई भी अंग्रेजों के विरुद्ध आवाज न उठाये । लेकिन एक १० वर्ष की कन्या ने ऐसी शूरता दिखाई कि सब देखते रह गये !

सीख व संकल्प : कैसा शौर्य ! कैसी देशभक्ति और कैसी धर्मनिष्ठा थी उस १० वर्षीय कन्या की । बालको! तु छोटे नहीं हो । हम बालक हैं तो क्या हुआ, उत्साही हैं हम वीर हैं । हम नन्हे-मुन्ने बच्चे ही, इस देश की तकदीर हैं ।। तु भी ऐसे बनो कि भारत फिर से विश्वगुरु पद पर आसीन हो जाय । आप अपने जीवनकाल में ही फिर से भारत को विश्वगुरु पद पर आसीन देखो... हरि ॐ... ॐ... ॐ...
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