स्वार्थ नहीं परमार्थ के लिए
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स्वार्थ नहीं परमार्थ के लिए

गायक तानसेन सम्राट अकबर के दरबार में नवरत्नों में से एक रत्न के रूप में सम्मानित थे। 

एक बार अकबर ने तानसेन से कहा :"तुम गाते तो बहुत अच्छा हो परंतु मैं तुम्हारे गुरु के दर्शन करना चाहता हूँ,जिन्होंने तुम्हें इतना होनहार बनाया। उन्हें शीघ्र दरबार में बुलाओ।"

तानसेन ने कहा :"वे बुलाने से दरबार में नहीं आयेंगे।"

"तो उनके आगे कोई ऐसी भेंट रखो,जिससे राजी होकर आ जायें।"

"उन्हें किसी बाह्य भेंट से राजी नहीं किया जा सकता है । आप स्वयं श्रद्धा-भक्ति से उनके दर्शन करने चलो।"

अकबर सादे वेश में छुपकर तानसेन के गुरु हरिदासजी महाराज के दर्शन करने गया। वहाँ उनका थोड़ा सत्संग-भजन सुना तो अकबर की आँखों से आँसू बहने लगे,वह भावविभोर हो गया।

लौटते समय अकबर ने कहा :"तानसेन ! मुझे तो पहले लगता था कि तुम अच्छा गाते हो लेकिन आज तुम्हारे गुरूजी को सुनकर ऐसा लगा कि उनके जैसा कोई गा नहीं सकता है। बहुत आनंद आया,मन को शांति मिली।

तानसेन ! एक बात बताओ। तुम्हारे गुरु के भजन में व बोलने में जो रस है,शांति है,आनंद है वह तुम्हारे गाने व बोलने में क्यों नहीं है ?

तानसेन बोला :"हम दोनों की वाणी में केवल इतना ही फर्क है कि मेरे गुरुदेव भगवान को प्रसन्न करने के लिए गाते हैं और मैं आपको प्रसन्न करने के लिए,कुछ पाने के लिए गाता हूँ ।

✍🏻आप भी जो कार्य करो स्वार्थ के लिए नहीं अपितु परमार्थ के लिए करो,
प्रभुप्रीति के लिए करो। परमार्थ के लिए किया गया कोई भी कार्य आपको तो शांति व आनंद देगा ही,साथ ही दूसरे लोग भी उससे आह्लादित होंगे। ऐसे कार्य में आपकी योग्यता भी निखरेगी।अतः अपने कर्म को अहंकार बढ़ाने के लिए,वासना में उलझाने के लिए नहीं बल्कि प्रभुप्रीति के लिए,वासना मिटाने के लिए करें। अपना कर्म कर्मयोग बना दो।

📚लोक कल्याण सेतु/फ़रवरी-मार्च २००८
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