एक सच्चे साधक की कृतज्ञता
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एक सच्चे साधक की कृतज्ञता

Thanks to one true seeker

यह अध्यात्म का सिद्धांत है कि साधक को दूसरों द्वारा अपने प्रति किया गया उपकार जीवनभर नहीं भूलना चाहिए,अन्यथा कृतघ्नता का दोष लगेगा एवं अपने द्वारा दूसरों पर किया गया उपकार याद नहीं रखना चाहिए,अन्यथा मन में बदले में कुछ पाने की इच्छा होगी और न मिलने पर चित्त दुःखी होगा,साथ ही "मैं परोपकारी हूँ" ऐसा अहं भी जागृत होने की संभावना रहेगी ।

तीर्थराम (बाद में स्वामी रामतीर्थ) स्नातक की परीक्षा की तैयारी कर रहे थे। उनके पास परीक्षा-शुल्क चुकाने के लिए पूरे रूपये नहीं थे। बहुत कोशिश करने पर भी पाँच रुपये की कमी रह ही गयी । जिससे उदास हो तीर्थराम चन्दू हलवाई की दुकान से गुजर रहे थे तो चंदू ने उनसे उदासी का कारण पूछा ।

तीर्थराम ने अपनी परेशानी बतायी । हलवाई ने उसी समय उन्हें पाँच रुपये दे दिये। बाद में गणित विषय में शत-प्रतिशत अंक पाकर अपनी अद्वितीय प्रतिभा से तीर्थराम गणित के प्राध्यापक बन गये ।

एक दिन वे चंदू हलवाई की दुकान के सामने से निकले,
तब हलवाई बड़ी विनम्रतापूर्वक उन्हें बोला :
"आपके द्वारा मनीआर्डर से भेजे गए पैंतीस रुपये मेरे पास जमा हैं । प्रति माह आपके द्वारा पाँच रुपये का मनीऑर्डर आ रहा है ।"

तीर्थराम बोले :"यह सब आपके उन पाँच रुपयों के बदले में है । वे रुपये मुझे मौके पर न मिलते तो मैं इस स्तिथि में कभी नहीं पहुँच पाता ।"

सीख :- परम सत्य के खोजी साधक के हृदय में अपने पर उपकार करनेवाले के प्रति कैसी कृतज्ञता की भावना होती है,उसका यह अनुपम उदाहरण है ।

बाल संस्कार के शिक्षकों से - बच्चों को समझाये हम सभी पर पूज्य गुरुदेव के अनंत उपकार हैं,वे हमें संसार-सागर से तारने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं अतः हमें उनके प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए ।

📚लोक कल्याण सेतु/अप्रैल-मई २००६
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