रूप में भिन्नता तत्व में एकता
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रूप में भिन्नता तत्व में एकता

एक युवक ने आनन्दमयी माँ के सम्मुख जिज्ञासा प्रकट की :" माँ! संत तुलसीदास जी तो महान ज्ञानी व भक्त थे।..."

माँ ने कहा : "नि:सन्देह वे थे ही !"
"उन्हें जब भगवान ने श्री कृष्ण के विग्रहरूप में दर्शन दिए,तब उन्होंने यह क्यों कहा कि "मै आपका इस रूप में दर्शन नहीं चाहता,मुझे राम रूप में दर्शन दीजिए।' क्या यह ज्ञान की बात है ? भगवान ही तो सबमें हैं फिर इस तरह तुलसीदास जी ने उनको भिन्न क्यों समझा ?"

माँ बोलीं :"तुम्ही तो कहते हो कि वे ज्ञानी भी थे,भक्त भी थे। उन्होंने ज्ञान की ही बात तो कही कि"आप हमें राम रूप में दर्शन दीजिए।मै आपके कृष्ण रूप में दर्शन नहीं करना चाहता।"

यही प्रमाण है कि वे जानते थे कि 'श्री राम और श्री कृष्ण एक ही हैं,अभिन्न हैं ।'
'आप मुझे दर्शन दीजिए।' - यह उन्होंने कहा था।

'रूप' मात्र भिन्न था पर मूलतः तत्व तो एक ही था। इन्हीं शब्दों में तो उन्होंने अपनी बात कही। भक्ति की बात तो उन्होंने यह कही कि 'मै राम के रूप में ही आपके दर्शन करना चाहता हूँ क्योंकि यही रूप मुझे प्रिय है।'
इस कथन में ज्ञान और भक्ति दोनों भाव प्रकाशित होते हैं।"

ऋषि प्रसाद/जुलाई 2017
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