दूरदृष्टि
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दूरदृष्टि

गुरु-सन्देश
सादा,सस्ता जीवन और ऊँचे विचार हों तथा ऊँचे-में-ऊँचे आत्मा में गोता मारो । हे नाथ !...हे प्रभु !... मन को भगवद् भाव से ,भगवद् सुख से भरते रहो और जेब को करकसर से छका रहने दो । घर को सादगी और स्नेह से,व्यवहार को प्रेम और प्रभुस्मृति से प्रभुपूजा बना दो ।
 -पूज्य संत श्री आशारामजी बापू 

महाराजा रणजीतसिंह अपनी संस्कृति-निष्ठा के लिए जितने मशहूर थे,उतने ही वे अपनी विलक्षण बुद्धिमत्ता के लिए भी प्रसिद्ध थे । एक बार उनके दरबार में एक अंग्रेज व्यापारी आया। वह अपने साथ काँच से निर्मित कई प्रकार की वस्तुएँ लाया था। वह अपना सामान रणजीत सिंहजी को दिखाने लगा ।

रंजीतसिंहजी कुछ देर गौर से देखते रहे फिर उन्होंने शीशे का एक फूलदान उठाया और दरबार के बीचोंबीच फेंका । गिरते ही वह फूलदान चूर-चूर हो गया। सभी दरबारी चकित रह गये। रणजीतसिंहजी ने टूटे हुए फूलदान के टुकड़ों को मँगवाया और उस व्यापारी को दिखाते हुए कहा :"इस टूटे हुए काँच का क्या मूल्य होगा?"
अंग्रेज व्यापारी बोला :"कुछ भी नहीं ।"

फिर राजा ने अपनी पीतल की दवात एक नौकर को देते हुए कहा :"इसे हथौड़ी से तोड़कर मेरे पास लाओ।"
आज्ञा का पालन हुआ। अब उन्होंने नौकर को कहा कि "बाजार में जाकर इसे बेच आओ ।" कुछ ही देर में वह दो पैसे लेकर आया और इसकी जानकारी राजा को दे दी । अंग्रेज भी देख रहा था ।

रंजीतसिंहजी ने व्यापारी से कहा :"देखा तुमने ,तुम्हारे टूटे सामान का कोई मूल्य नहीं पर हमारे टूटे सामान का मूल्य है । हमारे दादा-परदादा का ख़रीदा हुआ सामान आज भी हमारे काम आ रहा है । यह सामान जब भी टूटे-फूटेगा,कुछ-न-कुछ कीमत अवश्य दिला देगा।  अतः हमारी रूचि काँच के सामान में बिल्कुल भी नहीं है ।"

अंग्रेज सौदागर भारत-
वासियों की दूरदृष्टि से बहुत प्रभावित हुआ और महाराजा रंजीतसिंहजी से व्यापार का एक नया पाठ पढ़कर भारत से अलविदा हुआ ।

   ✍🏻आजकल इन मॉलों के मायाजाल समाज को नोच लेंगे और लुभावनी पैकिंग के द्वारा शोषित होना पड़ेगा।
विदेशों में इन मॉलों ने आम आदमी को क्रेडिट कार्ड के द्वारा इतना तो नोच लिया है कि शुक्रवार को तनख्वाह मिलती है पर सोमवार को खर्च करने के लिए पैसा नहीं होता है । अतः इन मॉलों से,क्रेडिट कार्डों से और दिखावटी पैकिंग से प्रभावित न हों।सादा,सस्ता जीवन और ऊँचे विचार हों तथा ऊँचे-में-ऊँचे आत्मा में गोता मारो । हे नाथ !...हे प्रभु !... मन को भगवद् भाव से ,भगवद् सुख से भरते रहो और जेब को करकसर से छका रहने दो । घर को सादगी और स्नेह से,व्यवहार को प्रेम और प्रभुस्मृति से प्रभुपूजा बना दो ।

 📚लोक कल्याण सेतु/अप्रैल-मई २००८/अंक १३०
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