चेला नहीं,सीधे गुरु बनाया
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चेला नहीं,सीधे गुरु बनाया

पूज्य संत श्री आशारामजी बापूजी

राजस्थान में एक हो गये केताजी महाराज। उनके पास एक लड़का आया दीक्षा लेने के लिए। 
वे बोले :"अरे,क्या दीक्षा दें,
जरा रुको,देखेंगे।" लड़का भी पक्का था। देखते-देखते,गुरु महाराज की गायें चराते-चराते एक साल हो गया। उसने गुरूजी से प्रार्थना की :"महाराज ! दीक्षा दीजिए।"
महाराज बोले :"देखेंगे।"
दो-चार गायों में से कई हो गयीं। जंगल में गायें चराने जाय और कभी-कभी गुरूजी के पास आये,ऐसा करते-करते गुरूजी ने उसे अपने कमरे तक की सेवा दी। केताजी महाराज आज दीक्षा देंगे,दो महीने बाद देंगे - ऐसा करते-करते दस साल बीत गए। गुरूजी भी पूरे फक्कड़ थे और लड़का भी फक्कड़ ! लड़का जाए नहीं और गुरूजी दीक्षा देवें नहीं।

एक दिन गुरूजी ने सोचा कि अब जरा देखें। केताजी महाराज ने कहा :"देख जरा मटका उठा और तालाब से पानी भर ला।" 
पुराने जमाने की बात है। वह मटका भर के आया। केताजी महाराज ने पूछा :"कौन-से तालाब का पानी भर के लाया ?"
बोला:"नजदीक वाले तालाब का।"
"छि:! उसमें तो भैंसें भी बैठती हैं।"
मारी छड़ी,मटका फोड़ दिया। सुबह-सुबह पौष मास की ठंड,सूरज उगा नहीं। लड़का तो ऐसे ठिठुर रहा था और मटके पर मारी छड़ी तो पूरा मटका उस पर ढुल गया। वह पूरा भीग गया।
"बेवकूफ कहीं का ! उस दूसरे तालाब का पानी ले आ।"
वह गया,दूसरे तालाब का पानी ले आया ।
"अरे ! दूसरे तालाब का  लाया लेकिन तालाब के बीच से लाया कि किनारे-किनारे से ?"

अब केताजी महाराज यह समझते थे कि तालाब के बीच जायेगा तो डूब मरेगा,किनारे से ही भरना होता है।
"गुरूजी ! मैं तो किनारे-किनारे से ले आया ।"
"धत् तेरे की !"
मार दी छड़ी। वह छोरा फिर भीग गया। ऐसा ही कोई-न-कोई बहाना करके सात बार मटका फोड़ दिया। ठंड में वह लड़का काँपता रहा लेकिन गुरु का द्वार न छोड़े नहीं।
"अब जा,चला जा तू अपने घर ! जा के काम-धंधा करो। बाबाओं के पीछे क्या लगे हो ? लेकिन जाते-जाते एक मटका पानी का तो दे जा गुरु को।"

एक मटका पकड़ा दिया। वह तालाब के किनारे गया,मटका रखकर बैठ गया। बेचारा ठंड से काँप रहा था। सोचा कि 'अब की बार जाऊँगा तो ठंड से मर ही जाऊँगा ।' 
मन ने कहा :'अरे,भाग चल यहाँ से ! गुरूजी आठवें मटके को भी मारेंगे डंडा । शरीर में तो अब ताकत भी नहीं रही। मैं भाग जाऊँ,क्या करूँ ?'

धीरे से उठा और गुरु के इलाके को प्रणाम करके चलने लगा तो मटके से आवाज आयी कि "ऐ ! कहाँ जाता है ?"
लड़के ने सोचा,'इस मटके से  गुरुदेव की आवाज कैसे आ रही है ! नहीं,यह मेरे मन का भ्रम होगा। गुरुदेव तो आश्रम में केता-कुटीर में हैं।' थोड़ा चला,फिर आवाज आयी :" अरे,सुनता नहीं!"

फिर गुरु महाराज का सूक्ष्म शरीर कहो,योगशक्ति कहो,ईश्वर की लीला कहो,
वह मटका अपनी गाथा सुनाने लगा कि "मैं कुदाली और फावड़ों से मिट्टी के ढेर में से कटा,फिर कुम्हार ने मुझमें पानी डाला,मुझे रौंदा। फिर चाक पर घुमाया और आगे-पीछे हाथ रख के मार-मार के मुझको घड़ा बनाया। फिर धूप में सुखाया। उसके बाद । मुझे नेवे में डाल दिया और पकाया । इतना-इतना सहा फिर भी मैं डटा रहा तो आज तुम्हारे जैसे भक्त के सिर पर बैठने का अवसर आया और तू मुझे छोड़कर जा रहा है!"

लड़का सोचने लगा,'यह क्या है ?'
अरे,तेरी पुण्याई है Iइसलिए घड़े के रूप से भगवान तुझको प्रेरणा दे रहा है। गुरु महाराज की सत्ता कहो, गुरु महाराज का चैतन्य कहो तुझको प्रेरणा दे रहा है।
फिर आवाज आयी :"चल,
भर पानी ! कायर क्यों बनता है ?"
उसने मटका उठाया,'जय गुरु महाराज!' करके भरा और गुरु महाराज के पास पहुँचा । 
केताजी बोले :"क्यों रे ! लाया पानी ?"
"हाँ गुरूजी ! लाया हूँ।"
"तू घर भाग रहा था क्या ?"
"हाँ गुरूजी!"
"फिर क्या हुआ?"
"इस मटके से आवाज आयी।"

केताजी बोले :"भगवान कैसे समर्थ हैं ! जड़ में से भी ध्वनि कर सकते हैं,चेतन में से भी कर सकते हैं। कैसे रक्षक,पोषक हैं ! कैसे सर्वनियन्ता हैं!

तेरे को चेला क्या बनाऊँ,तू कौन है जरा सोच । चेला क्यों बनना चाहता है ? कौन गुरु कौन चेला,चलाचली का  मेला।"
लड़का केताजी को देख रहा है,केताजी लड़के को देख रहे हैं। गुरु ने अपनी ब्राह्मी स्तिथि का स्फुरण कर दिया। उसके ज्ञान-नेत्र खुल गये। लड़का सीधा गुरु बन गया,चेला बना ही नहीं !

केताजी महाराज ने उसको चेला नहीं बनाया,सीधे गुरु ही बना दिया। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। मेरे लिए भी गुरूजी ने चेला-बेला का विधि-विधान नहीं किया। बस आज्ञा कर दी । हम रहे उसीमें अंतरात्मा का सुख मिल गया ।

📚ऋषि-प्रसाद /सितम्बर २०१३
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