उन्नति चाहो तो विनम्र बनो
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उन्नति चाहो तो विनम्र बनो

विद्या ददाति विनयम्। विद्या विनयेन शोभते। 

 अर्थात् विद्या विनय प्रदान करती है और वह विनय से ही शोभित होती है। 

हमारा सबका अनुभव है कि जो नम्र बनता है, वह सभी का प्यारा हो जाता है। 

शास्त्रकार यहाँ ʹविद्याʹ शब्द के द्वारा आत्मविद्या की ओर संकेत करना चाहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ʹगीताʹ में अर्जुन को आत्मविद्या का उपदेश दे रहे हैं और इन्हीं उपदेशों में विनम्र बनने का भी उपदेश आता हैः

तद्विद्धि प्रणिपातने परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।।

 ʹउस ज्ञान को तू तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ, उनको भली भाँति दंडवत् प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्म-तत्त्व को भलीभाँति जानने वाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्त्वज्ञान का उपदेश करेंगे।ʹ (गीताः 4.34) 

 किसी को विनम्रता का प्रकट रूप देखना हो तो उसे पूज्य संत श्री आशारामजी बापू के दर्शन करने चाहिए। ये अपने सत्संग-कार्यक्रम के अंतिम सत्र में हाथ जोड़कर कहा करते हैं- "सत्संग में जो अच्छा-अच्छा आपको सुनने को मिला, वह तो मेरे गुरुदेव का, शास्त्रों का, महापुरुषों का प्रसाद था और कहीं कुछ खारा-खट्टा आ गया हो तो उसे मेरी ओर से आया मानकर क्षमा करना।" आत्मविद्या के सागर पूज्य श्री की यह परम  विनम्रता देखकर सत्संगियों की आँखों से अश्रुधाराएँ बरसने लगती हैं। 

नम्रता विद्वान की विद्वता में, धनवान के धन में, बलवान के बल में और सुरूप के रूप में चार चाँद लगा देती है। हम किसी को छोटा न समझें। सच्चा बड़प्पन और सभ्यता भी नम्रता में ही है।

 ✍🏻जवाब दें और जीवन में लायें। 

 विद्या किससे शोभित होती है ? 

 नम्रता किसमें चार चाँद लगा देती है ?

 📚तेजस्वी बनो
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