सूर्य उपासना
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सूर्य उपासना

Surya Upasana | Sun Worship

     भगवान की आराधना और प्रार्थना जीवन में सफलता प्राप्त करने की कुञ्जी है। सच्चे भक्तों की प्रार्थना से समाज एवं देश का ही नहीं, वरन् समग्र विश्व का कल्याण हो सकता है। 

    ऋग्वेद में आता है कि सूर्य न केवल सम्पूर्ण विश्व के प्रकाशक, प्रवर्त्तक एवं प्रेरक हैं वरन् उनकी किरणों में आरोग्य वर्धन, दोष-निवारण की अभूतपूर्व क्षमता विद्यमान है। सूर्य की उपासना करने एवं सूर्य की किरणों का सेवन करने से अनेक शारीरिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक लाभ होते हैं। 

    जितने भी सामाजिक एवं नैतिक अपराध हैं, वे विशेषरूप से सूर्यास्त के पश्चात अर्थात् रात्रि में ही होते हैं। सूर्य की उपस्थिति मात्र ही इन दुष्प्रवृत्तियों को नियँत्रित कर देती है। सूर्य के उदय होने से समस्त विश्व में मानव, पशु-पक्षी आदि क्रियाशील होते हैं। यदि सूर्य को विश्व-समुदाय का प्रत्यक्ष देव अथवा विश्व-परिवार का मुखिया कहें तो भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। 

    वैसे तो सूर्य की रोशनी सभी के लिए समान होती है परन्तु उपासना करके उनकी विशेष कृपा प्राप्त कर व्यक्ति सामान्य लोगों की अपेक्षा अधिक उन्नत हो सकता है तथा समाज में अपना विशिष्ट स्थान बना सकता है। 

    सूर्य एक शक्ति है। भारत में तो सदियों से सूर्य की पूजा होती आ रही है। सूर्य तेज और स्वास्थ्य के दाता माने जाते हैं। यही कारण है कि विभिन्न जाति, धर्म एवं सम्प्रदाय के लोग दैवी शक्ति के रूप में सूर्य की उपासना करते है। 

    सूर्य की किरणों में समस्त रोगों को नष्ट करने की क्षमता विद्यमान है। सूर्य की प्रकाश – रश्मियों के द्वारा हृदय की दुर्बलता एवं हृदय रोग मिटते हैं। स्वास्थ्य, बलिष्ठता, रोगमुक्ति एवं आध्यात्मिक उन्नति के लिए सूर्योपासना करनी ही चाहिए। 

    सूर्य नियमितता, तेज एवं प्रकाश के प्रतीक हैं। उनकी किरणें समस्त विश्व में जीवन का संचार करती हैं। भगवान सूर्य नारायण सतत् प्रकाशित रहते हैं। वे अपने कर्त्तव्य पालन में एक क्षण के लिए भी प्रमाद नहीं करते, कभी अपने कर्त्तव्य से विमुख नहीं होते। प्रत्येक मनुष्य में भी इन सदगुणों का विकास होना चाहिए। नियमतता, लगन, परिश्रम एवं दृढ़ निश्चय द्वारा ही मनुष्य जीवन में सफल हो सकता है तथा कठिन परिस्थितियों के बीच भी अपने लक्ष्य तक पहुँच सकता है। 

    सूर्य बुद्धि के अधिष्ठाता देव हैं। विद्यार्थियों को प्रतिदिन स्नानादि से निवृत्त होकर एक लोटा जल सूर्यदेव को अर्घ्य देना चाहिए। अर्घ्य देते समय इस बीजमंत्र का उच्चारण करना चाहिएः

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रों सः सूर्याय नमः।

    इस प्रकार मंत्रोच्चारण के साथ जल देने से तेज एवं बौद्धिक बल की प्राप्ति होती है। 

    सूर्योदय के बाद जब सूर्य की लालिमा निवृत्त हो जाय तब सूर्याभिमुख होकर कंबल अथवा किसी विद्युत कुचालक आसन् पर पद्मासन अथवा सुखासन में इस प्रकार बैठें ताकि सूर्य की किरणें नाभि पर पड़े। अब नाभि पर अर्थात् मणिपुर चक्र में सूर्य नारायण का ध्यान करें। 

    यह बात अकाट्य सत्य है कि हम जिसका ध्यान, चिन्तन व मनन करते हैं, हमारा जीवन भी वैसा ही हो जाता है। उनके गुण हमारे जीवन में प्रगट होने लगते हैं। 

    नाभि पर सूर्यदेव का ध्यान करते हुए यह दृढ़ भावना करें कि उनकी किरणों द्वारा उनके दैवी गुण आप में प्रविष्ट हो रहे हैं। अब बायें नथुने से गहरा श्वास लेते हुए यह भावना करें कि सूर्य किरणों एवं शुद्ध वायु द्वारा दैवीगुण मेरे भीतर प्रविष्ट हो रहे हैं। यथासामर्थ्य श्वास को भीतर ही रोककर रखें। तत्पश्चात् दायें नथुने से श्वास बाहर छोड़ते हुए यह भावना करें कि मेरी श्वास के साथ मेरे भीतर के रोग, विकार एवं दोष बाहर निकल रहे हैं। यहाँ भी यथासामर्थ्य श्वास को बाहर ही रोककर रखें तथा इस बार दायें नथुने से श्वास लेकर बायें नथुने से छोड़ें। इस प्रकार इस प्रयोग को प्रतिदिन दस बार करने से आप स्वयं में चमत्कारिक परिवर्तन महसूस करेंगे। कुछ ही दिनो के सतत् प्रयोग से आपको इसका लाभ दिखने लगेगा। अनेक लोगों को इस प्रयोग से चमत्कारिक लाभ हुआ है। 

    भगवान सूर्य तेजस्वी एवं प्रकाशवान हैं। उनके दर्शन व उपासना करके तेजस्वी व प्रकाशमान बनने का प्रयत्न करें। 

    ऐसे निराशावादी और उत्साहहीन लोग जिनकी आशाएँ, भावनाएँ व आस्थाएँ मर गयी हैं, जिन्हें भविष्य में प्रकाश नहीं, केवल अंधकार एवं निराशा ही दिखती है ऐसे लोग भी सूर्योपासना द्वारा अपनी जीवन में नवचेतन का संचार कर सकते हैं।

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