अनोखी परीक्षा
Next Article चाणक्य स्कूल राजकोट में "संस्कार सिंचन कार्यक्रम"
Previous Article अभ्यास में रूचि क्यों नहीं होती

अनोखी परीक्षा

गुरु-सन्देश - शिक्षा लोकोपयोगी होनी चाहिए; शिक्षा सर्वहितकारी होनी चाहिए ।

गुरुकुल के आचार्य ने तीन शिष्यों से कहा : "तुम्हारी शिक्षा पूरी हो गयी । अब तुम लोग जा सकतेव् हो ।"
बिना परीक्षा लिए ही शिक्षा पूरी होने की बात से शिष्यों को आश्चर्य तो हुआ,फिर भी आचार्य को प्रणाम कर वे तीनों घर के लिए चल दिए । थोड़ी दूर चलने पर मार्ग में उन्हें काँटे बिखरे मिले ।
एक शिष्य ने कहा :"हमें इन काँटों से बचकर चलना चाहिए" और वह धीरे-धीरे बचता हुआ पार हो गया । दूसरा शिष्य अच्छा खिलाड़ी था । वह कूदता-फांदता काँटों से पार हो गया । तीसरे ने सोचा,"मै भी इनकी तरह काँटों से पार हो सकता हूँ परन्तु ये काँटे यहाँ पड़े रहे तो आने-जानेवालों को कष्ट होगा,उन्हें परेशानी होगी । इन काँटों को हटाकर मार्ग साफ कर देना अपना कर्तव्य है ।" उसने अपना सामान एक ओर रखा और काँटों को हटाने लगा । उसके हाथों में भी कुछ काँटे चुभे पर वह लगा रहा । उसके दोनों साथी कहने लगे :"क्यों परेशान हो रहे हो ? बचकर निकल आओ ।" किंतु वह उन दोनों की बात अनसुनी कर काँटे हटाने में लगा रहा और पूरे काँटे हटाकर ही रुका ।
आचार्य झाड़ियों के पीछे से उनकी बातें सुन रहे थे । वे सामने आ गये और बोले :"मैने ही परीक्षा लेने के लिए ये काँटे रास्ते में बिछाये थे । तुम दोनों परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो,यह उत्तीर्ण है । तुम दोनों की शिक्षा अभी पूरी नहीं हुई है ।" तीसरे शिष्य को आचार्य ने आशीर्वाद देकर विदा किया । पहले दो शिष्यों को अभी और शिक्षा की आवश्यकता बतायी।

📚लोक कल्याण सेतु/जून-जुलाई २००७/अंक-१२०
Next Article चाणक्य स्कूल राजकोट में "संस्कार सिंचन कार्यक्रम"
Previous Article अभ्यास में रूचि क्यों नहीं होती
Print
9601 Rate this article:
4.0
Please login or register to post comments.
RSS
First242243244245246247248249251