यह सेवा का पाठ है
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यह सेवा का पाठ है

"संसार की फुलवारी में अपने शरीर को खाद बना दो । यही सेवा है, और किस काम आयेगा रे शरीर ?"

एक दिन श्री रामकृष्ण परमहंसजी का एक शिष्य ‘गुरुजी से सेवा का कोई पाठ मिले इस भाव से उनके श्रीचरणों में पहुँचा । उसने देखा कि ठाकुर एकाग्र होकर एक कागज पर पेंसिल से कुछ रेखाएँ खींच रहे थे । परमहंसजी की दृष्टि शिष्य पर पडी और फिर से अपने कार्य में तन्मय हो गयी । कागज पर खिंचती जा रही रेखाएँ कुछ फूलों-सा आकार धारण कर रही थीं ।

ठाकुर : ‘‘समझे कुछ ?

‘‘नहीं बाबा ! आपकी बातें मैं भला कैसे समझ सकूँगा !

‘‘संसार फुलवारी की तरह है पागलचंद !

‘‘फुलवारी की तरह है तो..

कागज पर कुछ और रेखाएँ खिंच गयीं । देखते-देखते बोरी का चित्र बन गया और उस पर शब्द अंकित हुआ ‘खाद ।

‘‘क्या समझे ?

‘‘आप ही बताइये गुरुदेव !

करुणा छलकाते हुए ठाकुर बोले : ‘‘अरे ! संसार की फुलवारी में अपने शरीर को खाद बना दो । यही सेवा है, और किस काम आयेगा रे शरीर ? शरीर का अभिमान करने से भोग-वासनाएँ ही तो बढेंगी या और कुछ ? खूब कर सेवा इस संसार की । हाँ, इतना ध्यान रख कि बदले में कुछ चाह मत । सेवा का कुछ अभिमान मत कर और न सेवा के प्रति राग ही रख ।

अब शिष्य के हाथ में था वह कागज, चेहरे पर सुकून और कानों में गूँज रही थी गुरुआज्ञा : ‘‘यह सेवा का पाठ है, प्रतिदिन पढा करो ।
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