पूज्य बापूजी के जीवन प्रसंग
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पूज्य बापूजी के जीवन प्रसंग

पूज्य बापूजी का अवतरण दिवस : ६ अप्रैल

दाहोद (गुज.) जिले के बरोदा गांव के निवासी मोहन भाई प्रजापति सन १९९९ से पूज्य बापूजी के सत्संग-सान्निध्य का लाभ लेते रहे हैं। अपने जीवन का एक अनुभव
बताते हुए वे कहते हैं:
पहले मैं रिक्शे से आजीविका चलाता था और गुटखा,बीड़ी, सिगरेट, दारू, मांस सेवन
आदि व्यसनों में डूबा रहता था। एक दिन भी दारू के बिना नहीं रहता था। घर में खूब लड़ाई
झगड़ा करता था।

एक बार हमारे गाँव के पास में पूज्य बापूजी का सत्संग था। मैं अपने रिक्शा से कुछ लोगों
को वहाँ छोड़ने जा रहा था तो वे लोग मुझसे बोले कि "आप भी दीक्षा ले लो।" 

मैंने कहा : “मुझसे भक्ति-वक्ति नहीं होगी,मैं दारू मांस के बिना नहीं रह पाता हूँ।"

नूरानी नजर और प्रसाद का असर
मैं जब पूज्यश्री के निवास स्थान पर पहुँचा तो बापूजी कुर्सी पर बैठे सत्संग कर रहे थे। मैंने
सोचा,'अब आया हूँ तो प्रणाम तो कर लें।' दूर से ही हाथ जोड़कर राम-राम किया तो बापूजी ने मुझे अपने पास बुलाया और एक क्षण मेरी तरफ देखा तथा काली द्राक्ष दी प्रसाद रूप में।

जैसे ही मेरे ऊपर उनकी दृष्टि पड़ी वैसे ही मेरे विचार बदल गये। मन में खूब शांति और आनंद आने लगा। मैंने प्रसाद खा लिया।

उसके बाद जब मैं दारु पीता तो रात को बापूजी सपने में आते और गुस्सा करते कि “तू दारू पीता है। खबरदार !!!
अनोखा तरीका देखा मैंने किसी को सुधारने का! 
न मैं उनका शिष्य था न शराब छुड़ाने की प्रार्थना की थी और न मैं चाहता था कि मेरी शराब छूटे। पर उस दिन मैंने प्रत्यक्ष देखा कि संत बिना किसी कारण के सबका हित करते हैं। जो एक बार उनके पास आ जाता है उसका वो किसी-न-किसी निमित्त से कल्याण कर ही देते हैं!
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