गौ सेवा से घातक रोग से मुक्ति
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गौ सेवा से घातक रोग से मुक्ति

गुरु-सन्देश

"गौरक्षा,गौसेवा और गौपालन मेरे हर साधक को प्रयत्नपूर्वक करना चाहिए"

-परम पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

गौ सम्पदा पत्रिका में छपी सौराष्ट्र के गाँव की यह घटना है । कुछ वर्ष पूर्व वहाँ एक अहीर कुटुम्ब मेहनत मजदूरी करके अपनी आजीविका चलाता था ।
कुटुम्ब में पति-पत्नी और उनका एक लड़का था ।

लड़के की सगाई होने के कुछ दिन बाद ही उसके पिता का देहांत हो गया ।उसके बाद तो भाग्य ने जैसे उससे मुख ही मोड़ लिया हो । लड़के को टी.बी. हो गया ।
गाँव में इलाज के साधन नहीं थे । शहर में इलाज करवाने का उनमें सामर्थ्य नहीं था । लड़कीवालों ने सगाई तोड़ दी पर माँ-बेटे निराश नहीं हुए । लड़का किसी किसान के यहाँ खेत की रखवाली का काम करने लगा । माँ-बेटे मेहनत-मजदूरी करके गुजारा करते और भगवान का भजन करते थे ।

एक बार बरसात के दिनों में खेत की रखवाली करके वह लड़का घर लौट रहा था । रास्ते में उसने देखा कि एक गाय गड्ढे के कीचड़ में बुरी तरफ फँसी हुई है । गाय बहुत कमजोर तथा भूखी-प्यासी थी । बाहर निकलने के प्रयास में वह बहुत थक चुकी थी । उसकी मरणासन्न दशा देखकर लड़के का हृदय दया से भर गया । उसने सोचा कि 'यदि मैं गौ को मौत के मुँह में पड़ी हुई छोड़कर जाऊँगा तो मनुष्य कहलाने लायक नहीं रहूँगा ।'

गाय की करुण अवस्था देखकर उसे अपनी बीमारी और कमजोरी का ख्याल ही नहीं रहा ।* उसने गौमाता को बाहर निकालने का निश्चय किया और प्रतिज्ञा की : "जब तक गौ माता को बाहर नहीं निकाल लेता तब तक अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा ।"

वह खेत से एक मजबूत रस्सा लाया और गाय को बांधकर खींचने लगा । पर यह काम अकेले उसके बस का नहीं था । तभी उधर से एक राहगीर गुजरा । उसने मदद के लिए उसे बुलाया । उस व्यक्ति ने गाय को पीछे से उठाने की कोशिश की और आधे घण्टे के परिश्रम के बाद वे गाय को बाहर निकालने में सफल हो गये।

गाय में खड़े होने तक की शक्ति नहीं थी । लड़के ने उसे घास खिलायी,जल पिलाया । गाँव से गुड़ लाकर खिलाया । तब उसमें चलने भर की शक्ति आयी और वह उसे अपने घर ले गया, फिर उसने अन्न-जल ग्रहण किया।

'अग्नि पुराण' में आता है :
स्पर्शनात् किल्बिषक्षय: ।
'गाय के स्पर्श से पापों का क्षय होता है ।' तो गौसेवा की महिमा का तो कहना ही क्या ! माता-पुत्र ने गाय की खूब सेवा की।* गाय तंदुरुस्त हो गयी,समय पर ब्यायी और माँ-बेटे को अमृत-सा दूध देने लगी । यह तो सेवा का प्रत्यक्ष फल मिला।

एक रात को लड़के ने स्वप्न में देखा कि एक अति तेजस्वी महापुरुष उसके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते हुए कह रहे हैं : "तुमने गाय की रक्षा की थी । मैं तुम पर प्रसन्न हूँ । अब तुम्हारी बीमारी मिट जायेगी और भी जो कष्ट होंगे वे सब दूर हो जायेंगे ।"

लड़के की नींद खुल गयी । उसने सब बातें माँ को सुनायीं । गौसेवा के फलस्वरूप लड़के का क्षय रोग नष्ट हो गया। उसे अच्छे वेतन पर शहर में काम मिल गया,अच्छे घराने में विवाह हो गया । घर में नित्य सत्संग-भजन होने लगा । उसका परिवार सुखी और समृद्ध हो गया ।

गौसेवा धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष की प्राप्ति में अत्यंत सहायक है । अतः गोस्तु मात्रा न विद्यते ।
'गौ की किसी के साथ तुलना नहीं हो सकती ।'
(यजुर्वेद : २३.४८)

मातर: सर्वभूतानां गाव: सर्वसुखप्रदा।
'गौएँ सम्पूर्ण प्राणियों की माता कहलाती हैं । वे सबको सुख देनेवाली हैं।
(महाभारत,अनुशासन पर्व : ६९.७)

📚लोक कल्याण सेतु/दिसम्बर २०१०

पाठकों से - गौ सेवा की महिमा बताती हुई ये कहानी बच्चों को गुरु-सन्देश के साथ जरूर सुनायें ।
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