भारत के गाँव गाँव में भारतीय संस्कृति के दर्शन
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भारत के गाँव गाँव में भारतीय संस्कृति के दर्शन

गाँधीजी के समकालीन एक संत अकाल के समय गाँव-गाँव जाकर गरीब कुटुम्बों में अनाज और गुड़ का वितरण कर रहे थे।

वे एक किसान के घर पहुँचे।१२-१३ साल की लड़की बाहर आयी। उससे पूछा :"घर में कोई नहीं है ?"
लड़की बोली :"मेरी माँ मजदूरी करने खेत गयी है और मेरे पिता का स्वर्गवास हुए दो साल हो गये हैं।"

महाराज बोले :"ले बेटा ! यह गुड़ ले ले।"
उनको लगा कि यह विधवा का घर है। दूसरों को देते हैं उससे जरा ज्यादा इनको देना चाहिए।
मगर वह लड़की कहती है :"हमें नहीं चाहिए ।"
"क्यों?"
"मेरी माँ बताती है कि जिसके लिए हमने मेहनत न की हो,ऐसा किसी का मुफ़्त का कुछ नहीं लेना चाहिए। हराम का खाने से बुद्घि कुण्ठित होकर हल्के विचार करती है।"
"तेरी माँ मजदूरी ही करती है या और कुछ भी है तुम्हारे पास ?"
"हमारे पास चार बीघा जमीन थी। मगर गाँव में पानी की बहुत कमी थी तो मेरी माँ ने जमीन बेचकर गाँव में पानी का कुआँ खुदवाया,जिससे गाँववालों को सुविधा से पानी मिल सके। अब मेरी माँ मेहनत करती है और उसी से हमारा जीवनयापन होता है। हमें मुफ़्त का गुड़ नहीं चाहिए।"

✍🏻यह संस्कृति अब भी भारत के गाँव में है और यही भारत की आध्यात्मिकता के दर्शन कराती है। परहित में अपना देने में देर न करें। मगर मुफ़्त का दान का लेने में संकोच करें ।

📚लोक कल्याण सेतु/नवम्बर २०१०
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