मातृदेवो भव । पितृदेवो भव
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मातृदेवो भव । पितृदेवो भव

मेरी माँ जब ज्यादा उम्र की हो गयी थी,८०-८५ साल की हो गयी होगी, तब मैंने उनको कहा ''माँ, तुम्हारे हाथ की रोटियाँ बना दो, तुम्हारे को परिश्रम तो पड़ेगा लेकिन तुम्हारे हाथ की एक बार रोटी खिला दो मेरे को ।' 

मुझे पता था कि मेरी माँ की उम्र हो गयी है, उसके लिए परिश्रम है रोटी बनाना लेकिन फिर भी माँ के हाथ की रोटी का मुझे पहले इतना स्वाद लगा हुआ था कि मेरे लिए तो हजारों लोग रोटी लानेवाले हैं फिर भी मैंने माँ को कहा:''माँ! आप मेरे लिए रोटी बना दो ।'" और मैं आपको पक्का विश्वासपूर्वक कहता हूँ, मुझे याद है कि माँ ने रोटी बनायी और मैंने खायी; और ऐसा नहीं कि बचपन की बात है, आशाराम बापू बनने के बाद की बात है।

माँ के मन में जो भाव होता है वह बच्चा जाने - न जाने लेकिन बच्चे का मंगल होता है। उसमें भगवदीय भाव, वात्सल्य होता है। ‘मातृदेवो भव । पितृदेवो भव ।' माता-पिता, गुरुदेव भले कभी डाँटते हुए दिखें, नाराज होते हुए दिखें फिर भी हमारा मंगल ही चाहते हैं।

माता-पिता तो वैसे ही बच्चों पर मेहरबान होते हैं लेकिन बच्चे-बच्चियाँ जब अपने माँ-बाप में भुगवद्बुद्धि करके उनका पूजन करेंगे तो माता पिता के हृदय में भगवान तो हैं ही हैं... अतः मैं तो चाहता हूँ कि माता-पिता के हृदय में सुषुप्त
भगवान जाग्रत होकर उन पर छलकें तो माता-पिताओं का भी भला और बच्चे-बच्चियों का भी
परम भला होगा।
और तुम्हारी संतानें कितनी भी बुरी हों लेकिन 14 फरवरी को बेटे-बेटियों ने अगर तुम्हारा पूजन कर लिया तो तुम आज तक उनकी गलतियाँ माफ करने में देर नहीं कर सकते हो और तुम्हारा दिलबर देवता उन पर प्रसन्न होने में और आशीर्वाद बरसाने में देर नहीं करेगा,मैं निष्ठा पूर्वक कहता हूँ।

-पूज्य बापूजी

ऋषि प्रसाद/जनवरी २०१४
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