मोती पश्चात्ताप के
Next Article चिथड़ों में छिपा लाल
Previous Article जला दो उसीको जिसने दी जलन

मोती पश्चात्ताप के

गुरु-सन्देश - जिसका हृदय किसी का कष्ट देखकर नहीं पिघलता उससे तो वह जड़ पेड़ कहीं ज्यादा अच्छा है जो थके-हारे राही को अपनी छाया तो देता है !


सर्दियों का मौसम था। हाथ को हाथ नहीं सूझे ऐसा घना कोहरा छाया हुआ था। एक गरीब किसान का बेटा शीत-लहर की चपेट में आ गया । इलाज के लिए गाँव के कुछ हमदर्द लोगों ने पैसे इकट्ठे करके उसको शहर के एक नामी डॉ. के पास भेजा। डॉ. ने पहले तो उस व्यक्ति को ऊपर से नीचे तक देखा और फिर बोला : "तुम्हारे बच्चे की हालत गम्भीर है,इसके इलाज में पाँच हजार रूपये लगेंगे । इतने पैसे लाये हो ?"

उस गरीब आदमी की आँखों में आँसू भर आये । वह गिड़गिड़ाते हुए बोला :
"साहब ! मेरे पास अभी चार सौ रूपये हैं । आप इन्हें लेकर मेरे बेटे का इलाज कर दीजिए । मेरी इकलौती संतान है । मै कैसे भी करके कुछ ही दिनों में आपकी पाई-पाई चुका दूँगा । साहब ! गरीब पर रहम कीजिए ।" - ऐसा कहकर उसने अपनी पगड़ी उतारकर डॉ. के कदमों में रख दी और हाथ जोड़ लिए ।

डॉ. पढ़ा होगा किसी कॉन्वेंट स्कूल में । उसने दुत्कारते हुए उस गरीब को बाहर निकलवा दिया । हाड़ कँपा देनेवाली ठंड में वह व्यक्ति अपने बच्चे को गोद में लिए रातभर बाहर बैठा रहा कि शायद डॉ. का दिल पसीज जाय,पर पत्थर पिघल सकता था उस डॉ. का हृदय नहीं ! आखिर सुबह होते होते उस मासूम ने दम तोड़ दिया ।

समय बीता,एक बार डॉ. अपने परिवार के साथ गाँव के अपने फार्म हाउस में छुट्टियाँ मनाने गया । वहाँ उसके बेटे को साँप ने डँस लिया । दवाइयों,इंजेक्शनों से जहर नहीं उतरा । बच्चे की हालत बिगड़ने लगी। उसके हाथ-पैर नीले पड़ने लगे,तब फार्म हाउस का चौकीदार पास के गाँव से जहर उतारनेवाले व्यक्ति को बुला लाया ।

संयोगवश वह वही व्यक्ति था जिसके बेटे का इलाज करने से डॉ. ने मना कर दिया था । डॉ. को पहचानने में उस व्यक्ति को देर न लगी । वह सारा दृश्य उसकी आँखों के सामने घूम गया । अपने आँसू छिपाते हुए उसने कोई जड़ी निकाली और पीसकर दंश के स्थान पर लेप कर दिया । धीरे-धीरे विष का प्रभाव दूर हुआ और कुछ ही देर में बच्चा उठकर बैठ गया । यह देखकर डॉ. की ख़ुशी का ठिकाना न रहा । ख़ुशी-ख़ुशी में डॉ. ने सौ-सौ के नोटों का एक पूरा बंडल ही उस गरीब के हाथ में थमा दिया । पर वह व्यक्ति धन का गरीब था दिल का नहीं ।
उसने वे रूपये डॉ. को वापस करते हुए कहा :
"साहब ! ये रुपये मेरी तरफ से आप रख लीजिये और जब कोई गरीब मासूम आपके पास आये तो इन पैसों से उसका इलाज कर देना,जिससे लाचारी के कारण किसी और को अपने प्राण न गँवाने पड़ें ।"

ये शब्द डॉ. को तीर की नाईं लगे । एकाएक वह उस गरीब के चहेरे को बड़े गौर से देखने लगा । उसके चेहरे का रंग उतर गया । शर्म से सिर झुक गया और आँखों से पश्चाताप के मोती बरस पड़े । गरीब ने अपनी झोली उठायी और चल दिया । आज डॉ. को जीवन का सबसे बड़ा पाठ मिल चुका था । उसका हृदय बदल गया । उसकी शोषण की वृति पोषण में बदल गयी ।

सीख :" मानवीय संवेदनाविहीन मानव भले ही कितने बड़े ओहदे पर हो,कितनी ही धन-सम्पदा का मालिक हो पर वह सच्चा कंगाल है और जिसका हृदय दूसरे का दुःख देखकर उमड़ आता है,
किसी की पीड़ा में पिघल जाता है,वह बाहर से भले गरीब दिखता हो पर सच्चा धनवान है ।

📚लोक कल्याण सेतु/ दिसम्बर २०१०
Next Article चिथड़ों में छिपा लाल
Previous Article जला दो उसीको जिसने दी जलन
Print
4608 Rate this article:
3.3
Please login or register to post comments.
RSS
123578910Last