ज्यों की त्यों धरि दीन्हीं चदरिया
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ज्यों की त्यों धरि दीन्हीं चदरिया

लाल बहादुर शास्त्री जयंती : २ अक्टूबर
      

 गुरु-सन्देश
"महापुरुषों की वाणी का अमिट प्रभाव होता है । वह व्यक्ति का जीवन ही बदल देती है ।"

काशी विद्यापीठ का विद्यार्थी छुट्टियों में अध्यापक के साथ उनके गाँव गया । अध्यापक के मकान के पास ही एक संगीत-प्रेमी वृद्ध संत कबीरजी का यह भजन गाया करते -
 झीनी-झीनी बीनी चदरिया ।।.. 
 सो चादर सुर नर मुनि ओढ़ी, 
 ओढ़ि कै मैली कीन्हीं चदरिया ।। 
 दास कबीर जतन सों ओढ़ी, 
 ज्यों की त्यों धरि दीन्हीं चदरिया ।। 
कबीरजी के अनुसार शरीर एवं अंत:करण में अहंबुद्धि करके राग-द्वेष से प्रेरित होकर कर्म करना यह भगवान द्वारा दिये गये वस्त्र को मैला करना और राग-द्वेष से रहित होकर निष्काम भाव से कर्म करते हुए अंतकाल में शरीर भगवद्-चरणों में अर्पण करना यह ईश्वरप्रदत्त वस्त्र को ज्यों-का-त्यों धर देना है। 

 वह छात्र इन पंक्तियों को सुनकर भाव-विभोर हो जाता,मानो समाधि लग गयी हो । एक दिन वह इन्हीं भावों में खोया हुआ था,तभी अध्यापक ने उसका ध्यान भंग करते हुए पूछा : "क्या सोच रहे हो ?"
छात्र : "गुरूजी ! यह कितना सुंदर गीत है ! मैं तो इन्हीं विचारों में खो जाता हूँ कि मैं भी अपने जीवन की चदरिया जतन से ओढ़कर ज्यों-की-त्यों धर दूँगा ।" 
अध्यापक का हृदय विद्यार्थी के प्रति भाव-विभोर हो उठा। उसे प्रोत्साहित करते हुए वे बोले :
 "खूब जतन से ओढ़ना बेटे ! खूब जतन से...." 

उस छात्र ने अपना वादा जीवनभर निभाया । उसका नाम था लाल बहादुर । यही बालक आगे चलकर भारत का प्रधानमंत्री भी बना । 
पिता के देहांत के बाद माँ ने उन्हें नाना के स्नेह-संरक्षण में पढ़ने के लिए 'हरिश्चंद्र विद्यालय' में दाखिल कर दिया । उसी समय देश भर में अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन की हवा बहने लगी। लाल बहादुर के हृदय में भी स्वतंत्रता संग्राम की ज्वाला भड़क उठी और वे असहयोग आंदोलन में शामिल हो गये । विद्यार्थी-जीवन में ही वे जेल की यात्रा कर आये । 
शास्त्रीजी की आवश्यकताएँ बहुत ही सीमित थीं । उनमें स्वयं कष्ट सहकर भी दूसरे का हित करने की परोपकार-भावना दृढ़ थी । आंदोलन के समय जेल में भी वे अपनी चीजें दूसरों को देकर प्रसन्न होते थे । एक बार उन्होंने अपना लैम्प दूसरे साथी को दिया और स्वयं तेल के दीये के सामने बैठकर शास्त्र पढ़ने लगे । 

प्रधानमंत्री पद का दायित्व सँभालते हुए उन्होंने अपने गौरवपूर्ण  सन्देश में कहा था : "हम अपने पड़ोसी देशों के साथ मित्रतापूर्ण किंतु आत्म-सम्मान के साथ संबंध बनाना चाहते हैं।" 
उन्होंने अपने कार्यकाल में अपना यह कथन सिद्ध भी कर दिखाया ।
 अंतिम समय उनके चेहरे पर ऐसी शांति व सन्तोष था जैसे वे कबीरजी के स्वरों से कह रहे हों -"मैंने अपनी चदरिया ज्यों-की-त्यों धर दीन्हीं है ।'

 📝शिक्षा : - क्षणिक भावावेश में आकर आदर्शों और सिद्धांतों की कँटीली राह पर बढ़ने का संकल्प तो कई लोग लेते हैं पर दृढ़ता के अभाव व प्रलोभनों से वे विचलित हो जाते हैं ।
लेकिन शास्त्रीजी ने उन परिस्तिथियों में भी,जब उन्हें स्कूल जाने के लिए पैसे के अभाव में तैरकर नदी पार करनी पड़ती थी तब और जब वे भारत के प्रधानमंत्री बने तब भी एक दिन भी अपने इस आदर्श से विचलित नहीं हुए । उन्होंने अपने उज्ज्वल,निःस्वार्थ जीवन में भ्रष्टाचार का दाग नहीं लगने दिया ।

 संकल्प-हम भी बुरी संगत,बुरे विचारों से बचकर महापुरुषों के उच्च आदर्शों पर चलकर अपनी चदरिया ज्यों की त्यों बनाये रखेंगे । 

 ✍🏻सोचें,समझें और जवाब दे... 
 लाल बहादुर शास्त्रीजी के जीवन में कौन-कौन से सद्गुण थे । 

 📚लोक कल्याण सेतु/सितम्बर २०११

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