जीवन का अमर फल
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जीवन का अमर फल

Eternal life

चेन्नई निवासी रामानुजम ने अपने पुत्र को पैसे देकर फल लाने के लिए बाजार भेजा । लड़का पैसे लेकर बाजार की ओर चल दिया । रास्ते में वह सोचता जा रहा था कि क्या-क्या फल खरीदेगा ।

तभी उसने देखा कि रास्ते पर एक गरीब वृद्ध भूख से छटपटा रहा है । उसकी तरफ कोई ध्यान नहीं दे रहा है । उस बालक का हृदय द्रवित हो गया । वह तुरंत दौड़ता हुआ बाजार में गया और उसके पास जो पैसे थे । उनसे खाने की सामग्री खरीदी और उस गरीब वृद्ध को खिला-पिलाकर तृप्त किया । इससे उस बालक को भी बड़ी आत्मतृप्ति मिली । वृद्ध ने बालक को ढेर सारे आशीर्वाद दिये । वह प्रसन्नमुद्रा में उछलता हुआ सीधे पिताजी के पास ही गया । उसे खाली हाथ आया देखकर रामानुजम ने पूछा : ‘‘अरे, तू फल नहीं लाया ?’’

बालक :  ‘‘पिताजी ! मैं फल नहीं, अमर फल लाया हूँ ।’’

 ‘‘कहाँ है अमर फल ?’’

थोड़ा रुककर बालक ने सारी घटना कह सुनायी, फिर बोला : ‘‘पिताजी ! मैं फल ले आता और हम लोग उन्हें खा लेते तो उससे हमें कोई विशेष लाभ नहीं होता । लेकिन उस आदमी को जो कई दिनों से भूखा था, भोजन मिल जाने से उसके पेट की ज्वाला शांत हुई । उसके अंदर बैठा परमेश्वर संतुष्ट हुआ, इससे उत्तम फल हमारे लिए क्या हो सकता है !’’

पिता ने गदगद होकर बेटे को सीने से लगाते हुए कहा : ‘‘मेरे लाल ! सचमुच, तू अमर फल लेकर आया है । तेरे जैसा सुपुत्र पाकर मैं धन्य हो गया । तेरे ये दिव्य गुण एक दिन जरूर तुझे महान बनायेंगे ।’’

इस धरती पर फलों की प्रजातियाँ अनेक हैं । फलों को खरीदने व बेचनेवाले भी बहुत हैं । लेकिन जो संतों के सत्संग से नश्वर फल को अमर फल में परिवर्तित करने की कला पा लेता है वह खुद संत बन जाता है । आगे चलकर यही बालक दक्षिण भारत के महान संत रंगदासजी के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।

 पूज्य बापूजी कहते हैं : ‘‘अगर सदुपयोग करने की कला आ जाय तो कर्म से मिली हुई चीज नश्वर होने पर भी आप शाश्वत के अधिकारी बनने लगेंगे । आधिभौतिक तन और धन का आध्यात्मिकीकरण आपको आत्मानुभूति कराने में सक्षम है ।’’

आप भाव को जितना उन्नत बनाते हैं, आध्यात्मिक बनाते हैं फल भी उतना ही उन्नत होता जाता है । भावग्राही जनार्दन ।भगवान भाव के भूखे हैं, ऐसा कहा जाता है । जैसे कोई गरीब है और उसे दयालुता के भाव से ‘बेचारा’ मानकर कुछ देते हैं तो उससे हमें स्वर्ग के नश्वर भोगों की प्राप्ति होगी । किंतु ‘लेनेवाले के अंदर परमेश्वर का निवास है और वह हमें सेवा का अवसर देकर हम पर उपकार कर रहा है’-

 इस भाव से कृतज्ञ होकर वस्तु देते हैं तो चीज वही-की-वही होने पर भी अमिट आत्मा-परमात्मा के दिव्य आनंद, आत्मसंतोष, आत्मसुख की प्राप्ति करानेवाली हो जाती है ।

वेदांत-ज्ञान से ओतप्रोत पूज्य बापूजी की जीवनी ‘श्री आशारामायण’ में भी आता है :

     भाव ही कारण ईश है,
     न स्वर्ण काठ पाषान ।
     सत चित आनंदरूप है,
     * व्यापक है भगवान ।।*

🔹 धन्य हैं पूज्य बापूजी के लाखों - लाखों शिष्य जो इस दिव्य भावना को शिरोधार्य करके अस्पताल के रोगियों, गरीबों, वनवासियों, अनाथों, विधवाओं आदि में फल-वितरण कर ऐसा अमर फल - दिव्य आत्मानंद पा रहे हैं कि जिसको कोई मिटा नहीं सकता । मृत्यु की भी ताकत नहीं कि इसे छीन सके, अपितु यह मृत्यु को ही मार भगाता है और शाश्वत आत्मा में जगा देता है ।
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