रोज-रोज सत्संग क्यों
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रोज-रोज सत्संग क्यों

कबीरदास जयंती : 28 जून

"सत्संग की आधी घड़ी, सुमिरन वरस पचास ।
वर्षा वर्षे एक घड़ी, अरहट फिरे बारहों मास ।।"
 
कबीरजी के पास एक व्यक्ति आया । उसने कहा : ‘स्वामीजी ! रोज-रोज सत्संग क्यों सुनें । सत्संग में जो बात हमने एक बार सुनी है, वही बात दूसरी बार सुननी पड़ती है,कई बार ऐसा होता है । ...तो जो बात हम एक बार सुन चुके हैं, उसको दूसरी बार क्यों सुनें ? बार-बार सत्संग सुनने की क्या जरूरत है ?’’

 कबीरदासजी ने हथौड़ा उठाया और एक कील को दीवार में ठोककर लगा दिया । 
दूसरे दिन वह व्यक्ति फिर आया और अपने प्रश्न का उत्तर पूछने लगा । कबीरजी ने हथौड़ा उठाया और उस कील को दो बार ठोक दिया। इस तरह दूसरे, तीसरे, चौथे और पाँचवें दिन भी यही हुआ ।

आखिर वह व्यक्ति परेशान होकर बोला : ‘‘मैं जब-जब प्रश्न करता हूँ तो आप हथौड़ा लेकर कील को ठोक देते हैं । आखिर यह क्या है ?’’ 

कबीरजी : ‘‘मैं तेरे प्रश्न का उत्तर दे रहा हूँ ।’’ 

व्यक्ति : ‘‘मेरे प्रश्न का उत्तर ?’’ 

कबीरजी : ‘‘हाँ ।’’ 

व्यक्ति : ‘‘मैं समझ नहीं पाया।’’ 

 कबीरदासजी ने कहा : ‘‘जैसे मैं रोज इस कील को हथौड़े से दीवार में ठोकता हूँ । मैंने जितनी बार इस कील पर हथौड़ा लगाया, कील दीवार में उतनी ही गहरी धँसती चली गई । ठीक इसी प्रकार यह जो मनरूपी कील है, इसको बार-बार सत्संग के हथौड़े लगा करके ही भगवान में, ईश्वर में प्रतिष्ठित किया जा सकता है । यह काम एक बार में न होगा, इसीलिये प्रतिदिन सत्संग की जरूरत पड़ती है ।’’ 

 ✍🏻सीख : हम अच्छी-अच्छी बातें केवल एक दिन ही नहीं.. वरन रोज-रोज सुनेंगे तो वे गहरे मन में उतरेंगी और हमें आसानी से पकड़ में आएंगी। 

 🙌🏻संकल्प : "हम प्रतिदिन ज्ञानवर्धक कहानी सुनेंगे। 

 ✒ मनरूपी कील को ईश्वर में लगाने के लिए कौन-सा हथौड़ा चाहिए ? 

 📚लोक कल्याण सेतु : जून 2000
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