जब पुतला बोला-“ प्रणाम गुरुवर”
Next Article When the clay model-child spoke and saluted the Guru
Previous Article चिदानंदमय देह तुम्हारी .....

जब पुतला बोला-“ प्रणाम गुरुवर”

आज का मनमुख मनुष्य विश्वास न करे ऐसी–ऐसी योग्शाक्तियों की गाथाएँ शास्त्रों में आती हैं | गोरखनाथजी के गुरु थे जोगी मत्स्येन्द्रनाथ | यात्रा करते–करते दोनोँ योगीयों ने तालाब के किनारे एक शांत, निरापद जगह देखी और वहाँ टिकने का भाव बना लिया |
मत्स्येन्द्रनाथ ने कहा : “बेटा गोरख ! जिस संजीवनी विद्या के बारे में तुमने आज तक सुना है न, उसको तुम सिद्ध कर सकते हो इस एकांत में | संजीवनी विद्या को सिद्ध करना है तो चार बातें चाहिए – श्रद्धा तुममें है, तत्परता भी है, ब्रम्हचर्य–संयम भी है, केवल एकांत में रहो और ध्यान से उसका जप करो | संजीवनी सिद्ध कर लो |”     
“जो आज्ञा गुरु महाराज !”
गुरु महाराज निकल गये | अब ये जोगी महाराज जप करते–करते ऐसे एकाग्र हुए कि थोड़े ही समय में पूरा शरीर जपमय हो जाता है| फिर रोटी बनाते हैं तो रोटी पर या बैंगन काटते हैं तो बैंगन में ‘ ॐ ‘ की आकृति आ जाती है | ऐसे हजारों –हजारों संसारी जीवन जीने वाले साधकों का यह अनुभव है | संसारी लोग झूठ भी बोलते हैं, पति–पत्नी के व्यवहार में भी फिसलते हैं तब भी मंत्र का प्रभाव रोटी में दिख सकता है तो संजीवनी मंत्र का जप करने वाले तो जोगी थे, ब्रम्हचारी थे, झूठ–कपट रहित थे और एकांत में साधना करते थे |
वहाँ से थोड़ी दूरी पर कनक गाँव था | गाँव के बच्चे तालाब के किनारे खेलने आते थे | तालाब की गीली मिट्टी लेकर उन्होंने बैलगाड़ी बनाई | बैलगाड़ी बनाने तक तो सफल हुए लेकिन बैलगाड़ी चलाने वाला मनुष्य का पुतला बनाने में वे विफल हो रहे थे | लड़कों को सुझा कि वहाँ जोगी महाराज रहते हैं |
“बाबाजी! बाबाजी! हमको गाड़ीवाला बनाकर दीजिये |”
गोरखनाथजी ने कहा : “घर जाओ !” उन्होंने सोचा कि ‘अगर मैं बनाऊँगा तो भीडभाड से लिप्त हो जाऊँगा |’ लेकिन वे बच्चे दूसरे दिन भी आये |
“बाबाजी ! हमको बैलगाड़ी वाला बनाकर दो | हम बच्चे हैं न, आप बना सकते हो | “
लडकों का प्रेम, नम्रता, हठ देखकर गोरखनाथजी ने कहा : “ लाओ बेटे ! बना दूँ |”
वे पुतला बनाने लगे | जब तुम रोटी बनाते हो तब तुम थोड़े ही सोचते हो की हमारी रोटी में ‘ॐ’ निकले | रोटी बनाते–बनाते रोटी में ‘ ॐ ‘ का प्रभाव आ जाता है | गोरखनाथजी के तो रोम –रोम से संजीवनी मंत्र चल रहा था | वे पुतले के अंग–प्रत्यंग बनाते गये और मंत्र के प्रभाव से वह सजीव होता गया | उसमे मानवीय हिल-चाल होने लगी |
जब पुतला पूरा हुआ तो वह बोला : “प्रणाम गुरुवर !”
गोरखनाथजी चौंके, यह क्या हो गया ! लड़के घबराये | आज का आदमी तो यह सुनकर बोलेगा , ‘यह सब बन्द्ल्बाजी है |’ लेकिन मैं उनको कहता हूँ कि मैं बताता हूँ वैसी साधना करो | बंडल बोलने की तुम्हारी बेवकूफी चली जाय ऐसी–ऐसी साधनाएँ हैं ! हालाँकि संजीवनी विद्या की साधना मैंने नहीं की है, न ही मैं जानता हूँ लेकिन मैं मेरी थोड़ी भुत भी साधना सिखाऊँ न, तो तुमको मानना पड़ेगा की ‘अरे, इतना सारा क्या–क्या है !’ हमने केवल ४० दिन का अनुष्ठान किया था और उसका ऐसा खजाना मिला की बाँटते–बाँटते ४८ साल हो गये| अभी तक नहीं खूटता है | उसी खजाने के प्रभाव से तो इतने लोग बैठे रहते हैं घंटोभर ! मंत्रदीक्षा के बाद अगर एकाग्रता, तत्परता और संयम जुड़ जाय तो उस लाभ के आगे तुमको लगेगा कि ‘ धत तेरे की ! दुनियादार क्यों मजदूरी कर रहे हैं प्रमाणपत्रों के पीछे ! तीन पढ़े हुए बापू को कैसा लाभ हो गया |’
गोरखनाथजी ने कहा : “आसन लगाकर बैठ जा |” वह बैठ गया | लड़के तो भागे : “ भूत – भूत... मिट्टी में से भूत बन ग्य |” जाकर गाँव वालों को कहा | गाँव वाले आये देखने और वह तो बच्चा निकला ! गाँव वालों ने गोरखनाथ जी को नवाजा | इतने में गुरु महाराज भिक्षाटन करते हुए भिक्षा व दूध का कमंडल ले आये और दूध गर्म करके बच्चे को पिलाया तो वह सकुर–सकुर पी गया | मिट्टी में से बना हुआ बालक ! यह शरीर भी मिट्टी में से ही तो बना है, माँ – बाप के रज–वीर्य से |
मत्स्येन्द्रनाथ जी ने बच्चे पर अपनी कृपादृष्टि डाली | गाँव के लोग आने लगे | अब यहाँ एकांत–साधना, जप का तो समय गया | जोगियों ने वहाँ से विदाई लेना ही अच्छा माना | इतने में गाँव के ब्राम्हण और ब्राम्हणी, जिनको संतान नहीं थी, उन्होंने देखा कि इन महाराज ने तो बबलू बना दिया है | ब्राम्हण का नाम था मधु और पत्नी का नाम गंगा | उन्होंने बाबाजी की स्तुति की और गाँव वालों ने बताया कि “ ये नि:संतान हैं | आपकी कृपा से इन्हे संतान मिल सकती है |”
गोरखनाथ और मत्स्येन्द्रनाथ जी समझ गये | उन्होंने कहा : “ देखो, तुम घर पर जाकर इस बालयोगी के स्वागत की तैयारी करो, हम आते हैं | तुम्हारी सात–सात पीढियाँ तार देगा यह बालक | यह एक खास योगी बालक है, ऐसा समझकर इसका पालन–पोषण करना | हम भी बीच–बीच में आते रहेंगे और फिर कोई ऐसा समय आएगा की यह सब छोड़कर लोगों का भला करेगा |’’
बालक के संस्कार करने की, गोद लेने की सारी व्यवस्था हो गई |गाँव वालों ने पुरे कनक गाँव को अशोक के पत्तो से सजाया | शहनाइयाँ, सजावट, ताल–तम्बूरे के साथ गाँव में उत्सव हुआ | दो योगेश्वर अपनी योगशक्ति से बनायी हुई संतान ले आ रहे है |
आज रे आनंद भयो, म्हारा सद्गुरू आया पांवणा ......
उस बालक को ले जा है कनक गाँव में | पंचामृत आदि से बालक के चरण धोये गये | वेदवादी ब्राम्हणों के द्वारा बालक की आरती उतारी गयी| ‘हे योगी पुरूष ! हे अजन्मा आत्मा ! सृष्टि के नियमों  से विलक्षण ढंग से प्रकट होने वाले प्रभु! आप इस घर में निवास करिये और गंगा और मधु आपके माता–पिता जैसे लगेंगे लेकिन आप सभी के माता–पिता हो!’ बच्चा अर्पित कर दिया और जोगी ने देखा कि अब ‘प्रतिष्ठा.. शूकरी विष्ठा...’ एकांत समाधि का समय, जगह गयी... चलते बने |
इस आत्मदेव की क्या महिमा है ! आकाश में बैठकर भगवान दुनिया नहीं बनाते, यहीं बनाते हैं | मिट्टी में से जो बालक बना, वह आगे चलकर बड़ा सुप्रसिद्ध योगी हुआ| चौरासी सिद्धों में उसका नाम है | जैसे मत्स्येन्द्रनाथ जोगी, गोरखनाथ जोगी.. ऐसे ही वह बालक कहलाया ‘गहिनीनाथ जोगी’ | हमारे आत्मदेव का कैसा सामर्थ्य है ! मंत्रशक्ति ईश्वर की विलक्षण सम्पदा है |  
- स्त्रोत ऋषिप्रसाद जून २०१३ से
 

Next Article When the clay model-child spoke and saluted the Guru
Previous Article चिदानंदमय देह तुम्हारी .....
Print
7352 Rate this article:
1.0
Please login or register to post comments.
RSS
First45679111213Last