चतुश्पाद और चतुर्भुज
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चतुश्पाद और चतुर्भुज

पूज्य संत श्री आशारामजी बापूजी

एक दिन स्वामी अखण्डानन्दजी महाराज की एक शिष्या अपने नवविवाहित पुत्र एवं पुत्रवधू को लेकर उनके पास आयी। सबने महाराज को प्रणाम किया और आज्ञा पाकर बैठ गये। इस लड़के के बारे में शिष्या उनसे कई बार बात कर चुकी थी।

लड़का उच्छृंखल स्वभाव का था। उसकी शिक्षा अंग्रेजी विद्यालय में हुई थी। उसके संस्कार ऐसे बन गये थे कि न तो उसकी धर्म में आस्था थी और न ही संत-महात्माओं में । उसे सब कुछ पाखण्ड लगता था। वह बात-बात में भगवान और धर्म का मखौल उड़ाया करता था।

संत-महात्माओं को समाज पर भार बताया करता था। माँ उसके व्यवहार से अत्यंत दुःखी थी। वह महाराजजी से प्रार्थना करती रहती थी कि वे कोई ऐसा उपाय करें,जिससे लड़के की उद्दण्डता समाप्त हो। महाराज श्री उसे धैर्य रखने को कहते।

जब शिष्या,उसका पुत्र और पुत्रवधू बैठ गये तो महाराजश्री लड़के से बोले :"नारायण ! तुम्हारे कितने हाथ हैं ?"
लड़का झुँझलाकर बोला :
"यह कोई पूछने की बात है ? दो हैं!"
"और तुम्हारी पत्नी के?"
"उसके भी दो ही हैं ।"
"दोनों के मिलाकर कितने हुए ?"
"चार !"
"तुम्हारे कितने पैर हैं ?"
चार ! - लड़का उत्तर देना चाहता था,पर अपने पर काबू रखकर बोला :"दो !"
"और तुम्हारी पत्नी के ?"
"उसके भी दो ही हैं ।"
"दोनों को मिलाकर कितने हुए ।"
"चार !"

"अच्छा,नारायण ! जब पति पत्नी मिलकर शास्त्रोक्त नियमों का पालन करते हुए जीवन-यापन करते हैं तो वे चतुर्भुज हो जाते हैं । भगवदस्वरूप ! अगर शास्त्र-विरुद्ध जीवन बिताते हैं तो चतुश्पाद हो जाते हैं। बिल्कुल पशुवत् । नारायण ! चाहे तुम्हारी धर्म और संतों में श्रद्धा हो न हो किंतु संयमित जीवन में तो श्रद्धा होनी ही चाहिए । इससे तुम्हारा विकास होगा,उम्र बढ़ेगी,बुद्धि तीव्र होगी। अगर धर्म और संतों में श्रद्धा रहते हुए भी जीवन उच्छृंखल होगा तो पतन अवश्यम्भावी है।

देखो नारायण ! हर क्षेत्र में अच्छे और बुरे लोग होते हैं। आज धर्म के क्षेत्र में भी विकृतियाँ आ गई हैं। कुछ लोग हिन्दू धर्म को बदनाम करके अपने धर्म की डिमडिम मजबूत करना चाहते हैं।उनके संपर्क में आने वाले आजकल के बच्चे तुम्हारे जैसे उद्दण्ड हो जाते हैं,नहीं तो नारायण तुम्हारा खानदान हिन्दू धर्म के संस्कारों से सात्विक और शांत है और तुम मदिरा-मांस खाने वालों के सम्पर्क में उद्दण्ड,अशांत हो। किंतु धर्म में वही तेजस्विता है जो पहले थी। धर्म का अर्थ ही -'श्रेष्ठ गुणों की अवधारणा।'
इसी प्रकार संत वही है जो द्वन्द्वातीत हैं। किसी एक धर्माचार्य या संत के जीवन को आधार बनाकर धर्माचार्यों या संतों का मूल्यांकन मत करो। दूसरों को देखने से पहले स्वयं को भी देख लो। फिर किसी से शिकायत नहीं रहेगी। क्यों,यह ठीक है कि नहीं नारायण ?"

महाराज श्री की बातों का लड़के पर चमत्कारी प्रभाव पड़ा। उसने हाथ जोड़कर कहा :"आप ठीक कहते हैं। मैं आपकी बात सदा ध्यान में रखूँगा।"

पुत्र के इस परिवर्तन को देख माँ की आँखें हर्षातिरेक से छलछला आयीं । ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों की समझाने की रीति बड़ी विलक्षण होती है। उनकी वाणी के साथ परहित का संकल्प भी जुड़ा होता है और नजरों से अहैतु की प्यार बरसता है। उनका वचन दिल को छू जाता है और नास्तिक भी आस्तिक हो जाता है।

📚लोक कल्याण सेतु/सित.-अक्टू. २००६
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