दयालु बालक

दयालु बालक

लाल बहादुर जयंती : २ अक्टूबर

लालबहादुर शास्त्रीजी के मामा लगभग रोज मांस खाने के आदी थे।
कबूतर पालना, उड़ाना और रोज उनमें से एक को मारकर खा जाना उनका नियम था। 
एक दिन वे एक कबूतर को हाथ में लेकर बोले: “आज शाम तुम्हारी बारी है।" 
शाम को सभी कबूतर वापस आ गये पर वह कबूतर नहीं आया। वह खपड़े में छिपा हुआ था।

मामा ने लालबहादुरजी को उसे निकालने के लिए कहा।
दयालु-हृदय बालक ने कबूतर की प्राणरक्षा का वचन लेकर उसे निकाला लेकिन मामा अपनी बात से मुकर गये और उस कबूतर को मार के पकाकर खा गये।

यह देखकर लालबहादुरजी के अंतर्मन में बड़ी पीड़ा हुई। उस दिन उन्होंने भोजन नहीं किया। दूसरे दिन भी उन्होंने अनशन जारी रखा। 
छोटे-से बालक का अनशन देखकर मामा को वेदना हुई। उन्होंने मांसाहार छोड़ने का वचन दिया।
घर में फिर कभी मांस नहीं बना। सारा घर शाकाहारी बन गया। 

लालबहादुरजी के पहले सत्याग्रह की यह विजय थी। मानवीय संवेदनाएँ लालबहादुरजी में बचपन से ही थीं। शास्त्रीजी
में स्वयं कष्ट सहकर भी दूसरे का हित करने की परोपकार-भावना दृढ़ थी। 

✍🏻प्रधानमंत्री-पद का ऐसी निःस्वार्थ महान आत्माएँ जब किसी पद पर बैठती हैं तो उस पद की शोभा बढ़ती है।
दायित्व सँभालते हुए भी उन्होंने अपनी इन भावनाओं का ध्यान रखा। धन्य हैं ऐसे प्रधानमंत्री।

साहित्य : संस्कार सरिता
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