वे हारकर भी जीत जाते हैं

वे हारकर भी जीत जाते हैं

They win even they lose

जैसे रामजी वसिष्ठजी के चरणों में आत्मज्ञान पाकर धन्य हुए,ऐसे हो जाओ तुम !
-परम् पूज्य संत श्री आशारामजी बापूजी

दो प्रकार के व्यक्ति होते हैं । एक वो जो ईश्वर के आगे हार का रास्ता पसंद कर लेते हैं कि 'मैं भगवान की शरण हूँ,मैं सत्य की शरण हूँ,मैं कुछ नहीं हूँ,ईश्वर ही है,भगवान ही है ।' हारते-हारते अपना अहं भी हार देते हैं,हारने को कुछ बच नहीं जाता । जीवन की शाम में उनकी बड़ी जीत हो जाती है । जिस ईश्वर के लिए,धर्म और सत्य के लिए हारते चले जाते हैं,सत्य हराता नहीं है,सत्य अपने में मिला लेता है । वे जीत जाते हैं ।

दूसरे वे लोग हैं जो जीत का रास्ता पकड़ते हैं । चुनाव लड़ के,छल-कपट करके,विरोधी पार्टी की कुछ-की-कुछ बदनामी करके,अपनेवालों की जड़ें मजबूत करके 'जीत-जीत-जीत.... में लगे रहते हैं लेकिन मृत्यु के समय देखा जाय तो उनकी सारी जीतें ख्वाब का खेल बन जाती हैं और वासनाएँ व कर्मबंधन लेकर मरते हैं,बुरी तरह हार जाते हैं ।

धनभागी वे हैं जिनको आत्मा-परमात्मा के साक्षात्कार से सम्पन्न हुए हयात महापुरुष मिलते हैं । महापुरुष तो मिल गये लेकिन 'महान सिकन्दर' महान गलती करके अभागा रह गया । इससे तो शबरी भीलन महान निकली,मतंग गुरु के चरणों में बैठ गयी तो बैठ गयी । धन्ना जाट,संत रैदास महान आत्मा बने क्योंकि गुरु के ज्ञान को पाकर तृप्त हो गये । परमात्म ज्ञान,परमात्म-लाभ,परमात्म-शांति ही सर्वोपरि है ।

अतः भगवद्ज्ञान पा लो,भगवद् शांति पा लो,
भगवद् लाभ पा लो। भगवद् शांति,भगवद् लाभ कैसे मिले ?

जिनको भगवद् लाभ,
भगवद् शांति मिली है ऐसे पुरुषों का संग करो,ऐसे पुरुषों का जीवन-चरित्र पढ़ो । ऐसे पुरुषों को आदर्श मानकर उनके सिद्धांत में अपने मन को चलाओ और भगवान का ज्ञान पा लो । फिर राज्यसत्ता,धर्मसत्ता की सुवास से शोभायमान होगी । राजा राम,राजा जनक की नाईं राजनीति शोभायमान करो । रावण की नाईं वासना को पोसो मत । जैसे रामजी वसिष्ठजी के चरणों में आत्मज्ञान पाकर धन्य हुए,ऐसे हो जाओ तुम !
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