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विजयादशमी पर्व

जो अपने आत्मा को ‘मैं और व्यापक ब्रह्म को ‘मेरा मानकर स्वयं को प्राणिमात्र के हित में लगाके अपने अंतरात्मा में विश्रांति पाता है वह राम के रास्ते है । जो शरीर को ‘मैं व संसार को ‘मेरा मानकर दसों इन्द्रियों द्वारा बाहर की वस्तुओं से सुख लेने के लिए सारी शक्तियाँ खर्च करता है वह रावण के रास्ते है ।
हमारा चित्त प्रेम और शांति का प्यासा है । जब विषय-विकारों में प्रेम हो जाता है और उन्हें भोगकर सुखी होने की रुचि होती है तो हमारा नजरिया रावण जैसा हो जाता है । सदा कोई वस्तु नहीं, व्यक्ति नहीं, परिस्थिति नहीं, सदा तो अपना आपा है और सर्वव्यापक रूप में परमात्मा है । आपा और परमात्मा ये सदा सत्य हैं, सुखस्वरूप, ज्ञानस्वरूप, नित्य नवीन रस से पूर्ण हैं । अगर सुविधाओं का सदुपयोग सत् और शांति में प्रवेश पाने के निमित्त करते हैं तो यह राम का नजरिया है ।
तो दशहरा (विजयादशमी) यह संदेश देता है कि जो दसों इन्द्रियों से सांसारिक विषयों में रमण करते हुए उनसे मजा लेने के पीछे प‹डता है वह रावण की नार्इं जीवन-संग्राम में हार जाता है और जो इन्हें सुनियंत्रित करके अपने अंतरात्मा में आराम पा लेता है तथा दूसरों को भी आत्मा के सुख की तरफ ले जाता है वह राम की नार्इं जीवन-संग्राम में विजय पाता है और अमर पद को भी पा लेता है ।
श्रीराम और रावण दोनों शिवभक्त थे, दोनों बुद्धिमान व सूझबूझ के धनी थे । कुल-परंपरा की दृष्टि से देखा जाय तो रावण पुलस्त्य ऋषिकुल का ब्राह्मण और रामजी रघुकुल के क्षत्रिय हैं । कुल भी दोनों के ऊँचे और अच्छे हैं पर रावण भोग भोगके, शरीर को सुविधा देकर, बाहर के बड़े पद पाके बड़ा बनना चाहता था; संसारी रस पाकर सुखी होना चाहता था, अपने अंदर के रस का उसको पता नहीं था । रामजी अपने अंतरात्मा के रस में तृप्त थे, उनके नेत्र भगवद्रस बरसाते थे । जो लोग उन्हें देखते वे भी आनंदित हो जाते थे । श्रीरामजी जब रास्ते से गुजरते तब लोग घरों से, गलियों से बाहर आ जाते और ‘रामजी आये, रामजी आये ! कहके दर्शन कर आनंदित, उल्लसित होते । जब रावण रास्ते से गुजरता तब लोग भय से ‘रावण आया, रावण आया ! कहके गलियों और घरों में घुस जाते ।
भोगी और अहंपोषक रुलानेवाले रावण जैसे होते हैं और योगी व आत्मारामी महापुरुष लोगों को तृप्त करनेवाले रामजी जैसे होते हैं । रामजी का चिंतन-सुमिरन आज भी रस-माधुर्य देता है व आनंदित करता है । 
कहाँ रामजी अंतरात्मा के रस में, निजस्वरूप के ज्ञान में सराबोर और कहाँ रावण क्षणिक सांसारिक सुखों में रस खोज रहा था ! रामजी को बचपन में ही वसिष्ठजी का सत्संग मिला था । ‘श्रीयोगवासिष्ठ महारामायण में वसिष्ठजी कहते हैं : ‘‘हे रामजी ! जो मन को सत्ता देता है, बुद्धि को बल देता है, जिससे सारी सृष्टि उत्पन्न होती है, शरीर कई बार पैदा होकर मर जाता है फिर भी जो नहीं मरता वह अमर आत्मदेव तुम्हारा अंतरात्मा होकर बैठा है, तुम उसीको जानो ।
रामजी को वसिष्ठजी से इतना ऊँचा ज्ञान मिला तो वे अंतरात्मा के रस से तृप्त हो गये । रावण ने ‘यह पा लूँ, यह इकट्ठा कर लूँ ऐसा करके अपना सारा जीवन यश, वस्तुओं एवं भोग-पदार्थों को सँजोने में लगा दिया पर अंत में उसे खाली हाथ ही जाना पड़ा ।
राम और रावण का युद्ध तो पूरा हो गया पर आपके-हमारे जीवन में तो युद्ध चालू ही है । शुभ विचार धर्म-अनुशासित कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं, अशुभ विचार धर्म-विरुद्ध कर्म करवाते हैं, पत्नी कुछ चाहती है, पति कुछ चाहता है, बेटी कुछ चाहती है, बेटा कुछ चाहता है, नीति कुछ कहती है, व्यवस्था कुछ कहती है... तो इस प्रकार के युद्ध में जीव बेचारा हार न जाय इसलिए उसका मार्गदर्शन करते हुए तुलसीदासजी ने कहा है :
तुलसी हरि गुरु करुणा बिना बिमल बिबेक न होइ । 
भगवान और सद्गुरु की कृपा के बिना, सत्संग के बिना विवेक नहीं जगता कि ‘वास्तविक सुख कहाँ है, मनुष्य-जीवन क्यों मिला है ? सद्गुरु की कृपा-प्रसादी के बिना जीव बेचारा एक-दो दिन नहीं, एक-दो साल नहीं, एक-दो जन्म नहीं, युगों से रस खोज रहा है, शांति खोज रहा है पर उसको पता नहीं है कि वास्तविक रस व शांति कहाँ हैं ? इसलिए उसे सद्गुरु के सान्निध्य और सत्संग की आवश्यकता है ।  
संतों के सान्निध्य से ‘जीवन में वास्तव में क्या करणीय है, क्या अकरणीय है ? जीवन की उत्कृष्टता किसमें है ? मृत्यु आ जाय उससे पहले जानने योग्य क्या है ? यह जान लिया तो आपने संत-सान्निध्य का लाभ उठाया, मनुष्य-जीवन के ध्येय को पा लिया ।
इन्द्रिय-सुख की लोलुपता रावण के रास्ते ले जाती है तथा संत-महात्माओं द्वारा बतायी गयीं कुंजियाँ जीवन में राम का रस जगाती हैं और जीव देर-सवेर अपने वास्तविक स्वरूप को पा लेता है, जिसके लिए उसे मनुष्य-जीवन मिला है ।

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