विजया दशमी : दसों इन्द्रियों पर विजय
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विजया दशमी : दसों इन्द्रियों पर विजय

भारतीय सामाजिक परम्परा की दृष्टि से विजया दशमी का दिन त्रेता युग की वह पावन बेला है जब क्रूर एवं अभिमानी रावण के अत्याचारों से त्रस्त सर्वसाधारण को राहत की साँस मिली थी । कहा जाता है कि इस दिन मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने आततायी रावण को मारकर वैकुंठ धाम को भेज दिया था । यदि देखा जाय तो रामायण एवं श्री रामचरितमानस में श्रीराम तथा रावण के बीच के जिस युद्ध का वर्णन आता है वह युद्ध मात्र उनके जीवन तक ही सीमित नहीं है वरन् उसे हम आज अपने जीवन में भी देख सकते हैं ।
विजयादशमी अर्थात् दसों इन्द्रियों पर विजय । हमारे इस पंचभौतिक शरीर में पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ एवं पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं । इन दसों इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करनेवाला महापुरुष दिग्विजयी हो जाता है । रावण के पास विशाल सैन्य बल तथा विचित्र मायावी शक्तियाँ थीं परन्तु श्रीराम के समक्ष उसकी एक भी चाल सफल नहीं हो सकी । कारण कि रावण अपनी इन्द्रियों के वश में था जबकि श्रीराम इन्द्रियजयी थे ।
जिनकी इन्द्रियाँ बहिर्मुख होती हैं, उनके पास कितने भी साधन क्यों न हों ? उन्हें जीवन में दुःख और पराजय का ही मुँह देखना पड़ता है । तथाकथित रावण का जीवन इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है । जहाँ रावण की दसों भुजाएँ तथा दसों सिर उसकी दसों इन्द्रियों की बहिर्मुखता को दर्शाते हैं वहीं श्रीराम का सौम्यरूप उनकी इन्द्रियों पर विजय-प्राप्ति तथा परम शांति में उनकी स्थिति की खबर देता है । जहाँ रावण का भयानक रूप उस पर इन्द्रियों के विकृत प्रभाव को दर्शाता है, वहीं श्रीराम का प्रसन्नमुख एवं शांत स्वभाव उनके इन्द्रियातीत सुख की अनुभूति कराता है । 
विजयादशमी का पर्व - दसों  इन्द्रियों  पर  विजय  का  पर्व  है  ।  असत्य  पर  सत्य  की  विजय  का  पर्व  है ।
बहिर्मुखता पर अंतर्मुखता की विजय का पर्व है । अन्याय पर न्याय की विजय का पर्व है ।
दुराचार पर सदाचार की विजय का पर्व है । तमोगुण पर दैवीगुण की विजय का पर्व है ।
दुष्कर्मो  पर  सत्कर्मों  की  विजय  का  पर्व  है  ।  भोग  पर  योग  की  विजय  का  पर्व  है ।
असुरत्व पर दैवत्व की विजय का पर्व है तथा, जीवत्व पर शिवत्व की विजय का पर्व है ।
दसों इन्द्रियों में दस सद्गुण एवं दस दुर्गुण होते हैं । यदि हम शास्त्रसम्मत जीवन जीते हैं तो हमारी इन्द्रियों के दुर्गुण निकलते हैं तथा सद्गुणों का विकास होता है । यह बात श्रीरामचन्द्रजी के जीवन में स्पष्ट दिखती है । किन्तु यदि हम इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने के बजाय भोगवादी प्रवृत्तियों से जुड़कर इन्द्रियों की तृप्ति के लिए उनके पीछे भागते हैं तो अन्त में हमारे जीवन का भी वही हस्र होता है जो कि रावण का हुआ था । रावण के पास सोने की लंका तथा बड़ी-बड़ी मायावी शक्तियाँ थी परन्तु वे सारी-की-सारी सम्पत्ति उसकी इन्द्रियों के सुख को ही पूरा करने में काम आती थीं । किन्तु युद्ध के समय वे सभी-की-सभी व्यर्थ साबित हुर्इं। यहाँ तक कि उसकी नाभि में स्थित अमृत भी उसके काम न आ सका जिसकी बदौलत वह दिग्विजय प्राप्त करने का सामथ्र्य रखता था ।
संक्षेप में, बहिर्मुख इन्द्रियों को भड़कावाली प्रवृत्ति भले ही कितनी भी बलवान क्यों न हो लेकिन दैवी सम्पदा के समक्ष उसे घुटने टेकने ही पड़ते हैं । क्षमा, शांति, साधना, सेवा, शास्त्रपरायणता, सत्यनिष्ठा, कत्र्तव्य-परायणता, परोपकार, निष्कामता एवं सत्संग आदि दसों इन्द्रियों के दैवीगुण हैं । इन दैवीगुणों से संपन्न महापुरुषों के द्वारा ही समाज का सच्चा हित हो सकता है । इन्द्रियों का बहिर्मुख होकर विषयों की ओर भागना, यह आसुरी सम्पदा है । यही रावण एवं उसकी आसुरी शक्तियाँ हैं । किन्तु दसों इन्द्रियों का दैवी सम्पदा से परिपूर्ण होकर ईश्वरीय सुख में तृप्त होना, यही श्रीराम तथा उनकी साधारण-सी दिखनेवाली परम तेजस्वी वानर सेना है ।
प्रत्येक मनुष्य के पास ये दोनों शक्तियाँ पायी जाती हैं । जो जैसा संग करता है उसीके अनुरूप उसकी गति होती है । रावण पुलस्त्य ऋषि का वंशज था और चारों वेदों का ज्ञाता था । परन्तु बचपन से ही माता तथा नाना के उलाहनों के कारण राक्षसी प्रवृत्तियों में उलझ गया । इसके ठीक विपरीत संतों के संग से श्रीराम अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करके आत्मतत्त्व में प्रतिष्ठित हो गये ।
अपनी दसों इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करके उन्हें आत्मसुख में डुबो देना ही विजयादशमी का उत्सव मनाना है । जिस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी की पूजा की जाती है तथा रावण को दियासलाई दे दी जाती है, उसी प्रकार अपनी इन्द्रियों को दैवीगुणों से सम्पन्नकर विषय-विकारों को तिलांजलि दे देना ही विजया दशमी का पर्व मनाना है ।


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