बिना मुहूर्त के मुहूर्त
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बिना मुहूर्त के मुहूर्त

विजयादशमी का पूरा दिन स्वयंसिद्ध मुहूर्त है अर्थात् इस दिन कोई भी शुभ कर्म करने के लिए पंचांग-शुद्धि या शुभ मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं रहती । 
 -पूज्य संत श्री आशारामजी बापूजी 

विजयादशमी का दिन बहुत महत्व का है और इस दिन सूर्यास्त के समय अर्थात् संध्या का समय बहुत उपयोगी है ।
रघु राजा ने इसी समय कुबेर पर चढ़ाई करने का संकेत कर दिया था कि 'सोने की मुहरों की वृष्टि करो या तो फिर युद्ध करो ।'
रामचन्द्रजी रावण के साथ युद्ध में इसी दिन विजयी हुए । 
ऐसे ही इस विजयादशमी के दिन अपने मन में जो रावण के विचार हैं काम,क्रोध,लोभ
मोह,भय,शोक,चिंता - इन अंदर के शत्रुओं को जीतना है और रोग,अशांति जैसे बाहर के शत्रुओं पर विजय पानी है । दशहरा यह खबर देता है ।
अपनी सीमा के पार जाकर औरंगजेब के दाँत खट्टे करने के लिए शिवाजी ने दशहरे का दिन चुना - बिना मुहूर्त के मुहूर्त !
इसलिए दशहरे के दिन कोई भी वीरतापूर्ण काम करने वाला सफल होता है ।

वरतंतु ऋषि का शिष्य कौत्स विद्याध्ययन समाप्त कर घर जाने लगा तो उसने अपने गुरुदेव से गुरुदक्षिणा के लिए निवेदन किया ।
तब गुरुदेव ने कहा :"वत्स ! तुम्हारी सेवा ही मेरी गुरुदक्षिणा है। तुम्हारा कल्याण हो।"

परंतु कौत्स के बार बार गुरु दक्षिणा के लिए आग्रह करते रहने पर ऋषि ने क्रुद्ध होकर कहा :"तुम गुरुदक्षिणा देना ही चाहते हो तो चौदह करोड़ स्वर्णमुद्राएँ लाकर दो ।"
अब गुरूजी ने आज्ञा की है । इतनी स्वर्ण मुद्राएँ तो कोई और देगा नहीं,रघु राजा के पास गये । रघु राजा ने इसी दिन को चुना और कुबेर को कहा :"या तो स्वर्णमुद्राओं की बरसात करो या युद्ध के लिए तैयार हो जाओ ।" कुबेर ने शमी वृक्ष पर स्वर्ण मुद्राओं की वृष्टि की । रघु राजा ने वह धन ऋषिकुमार को  दिया लेकिन ऋषिकुमार ने अपने पास नहीं रखा,ऋषि को दिया ।

 शिक्षा :- विजयादशमी के दिन शमी वृक्ष का पूजन किया जाता है और उसके पत्ते देकर एक-दूसरे को यह याद दिलाना होता है कि सुख बाँटने की चीज है और दुःख पैरों तले कुचलने की चीज है । धन-सम्पदा अकेले भोगने के लिए नहीं है। 
तेन त्यक्तेन भुंजीथा.....।
जो अकेले भोग करता है,
धन-सम्पदा उसको ले डूबती है ।

 प्रार्थना व संकल्प - दशहरे की संध्या को भगवान को प्रीतिपूर्वक भजे और प्रार्थना करे कि 'हे भगवान ! जो चीज सबसे श्रेष्ठ है उसी में हमारी रूचि करना ।'
संकल्प करना कि "आज प्रतिज्ञा करते हैं कि हम ॐ कार का जप करेंगे ।"

 विशेष - "ॐ" का जप करने से देवदर्शन,लौकिक कामनाओं की पूर्ति,
अध्यात्मिक चेतना में वृद्धि,
साधक की ऊर्जा एवं क्षमता में वृद्धि और जीवन में दिव्यता तथा परमात्मा की प्राप्ति होती है ।
📚ऋषि प्रसाद /सितम्बर 2011
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