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भारतीय संस्कृति की गरिमा के रक्षक
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भारतीय संस्कृति की गरिमा के रक्षक

स्वामी विवेकानंद सन् १८९३ में शिकागो में जब विश्वधर्म परिषद का आयोजन हुआ था तब भारत के धर्मप्रतिनिधि के रूप में स्वामी विवेकानंद वहाँ गये थे विश्वधर्म परिषदवाले मानते थे किये तो भारत के कोई मामूली साधु हैं इन्हें तो प्रवचन के लिए पाँच मिनट भी देंगे तो भी शायद कुछ बोल नहीं पायेंगे... उन्होंने स्वामी विवेकानंद के प्रति उपेक्षापूर्ण व्यवहार किया और उनका मखौल डाते हुए कहा : ‘‘सब धर्मग्रंथों में आपका ग्रंथ सबसे नीचे है, अतः आप शून्य पर बोलें प्रवचन की शुरुआत में स्वामी विवेकानंद द्वारा किये गये उद्बोधनमेरे प्यारे अमेरिका के भाइयों और बहनों ! को सुनते ही श्रोताओं में इतना उल्लास छा गया कि दो मिनट तक तो तालियों की डगडाहट ही गूँजती रही तत्पश्चात् स्वामी विवेकानंद ने मानो qसहगर्जना करते हुए कहा : ‘‘हमारा धर्मग्रंथ सबसे नीचे है उसका अर्थ यह नहीं है कि वह सबसे छोटा है अपितु सबकी संस्कृति का मूलरूप, सब धर्मों का आधार हमारा धर्मग्रंथ ही है यदि मैं उस धर्मग्रंथ को हटा लूँ तो आपके सभी ग्रंथ गिर जाएँगे भारतीय संस्कृति ही महान है तथा सर्व संस्कृतियों का आधार है जिस चैतन्य आत्मा-परमात्मा की शक्ति से समग्र विश्व संचालित होता है उस चैतन्य तत्त्व का ज्ञान पाना यही भारत की आध्यात्मिक संस्कृति का बीज मंत्र है और इसीलिए भारतीय संस्कृति विश्व में सर्वोच्च है, सर्वोपरि है ।उस धर्मपरिषद में विवेकानंद को प्रवचन के लिए पाँच मिनट देने में भी जिन्हें तकलीफ होती थी, वे ही आयोजक उनके प्रवचनों के लिए श्रोताओं की ओर से प्राप्त सम्मान को देखकर दिग्मू हो रहे थे ऐसी महान संस्कृति एवं धर्म की सुरक्षा करने के बजाय हम पश्चिम की संस्कृति का अंधानुकरण करने से मुक्त नहीं हो रहे हैं यह हमारे समाज और देश के लिए कितनी शर्मजनक बात है !  

संकल्प : ‘हम भी रोज श्रीमद् भगवद्गीता के श्लोकों का पाठ अवश्य करेंगे

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