मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम
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मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम धर्म के साक्षात् स्वरूप हैं उनका चरित्र विश्वमानव के लिए आदर्श चरित्र है भगवान श्रीराम के बाल्यकाल से लेकर प्रयाणकाल तक की सम्पूर्ण लीलाएँ धर्म मर्यादा से ओत-प्रोत हैं भगवान श्रीराम अनन्त कोटि ब्रह्मांडनायक परब्रह्म होते हुए भी पारिवारिक जीवन में मर्यादा का इतना उत्कृष्ट आदर्श प्रस्तुत करते हैं कि समस्त विश्व उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तमकहकर संबोधित करता है

भाइयों के प्रति प्रे से उनका हृदय इतना द्रवित रहता था कि वे भाइयों के साथ खेलते समय स्वयं हार जाते लेकिन अपने भाइयों को हारा हुआ नहीं देख सकते थे जब गुरुजनों एवं माता-पिता के बीच राज्याभिषेक की चर्चा चली तो सबका झुकाव श्रीरामजी की ओर था तब रामजी सोचने लगे किसब भाई एक साथ जन्मे, साथ-साथ सबका पोषण हुआ, साथ-साथ खाये-पीये, खेले-पढ़े फिर यह क्या कारण है कि एक ही भाई को राजगद्दी मिले ?’ वे हमेशा पहले भाइयों की सुख-सुविधा की बात सोचते, बाद में अपनी

रामजी ने पिता के सत्य, धर्म की रक्षा के लिए अपने राज्याभिषेक के दिन ही समस्त राजसिक सुखों को ठोकर मारकर 14 वर्ष का कष्टमय वनवास स्वीकार कर लिया । पिता की मृत्यु, भाइयों की हृदय-व्यथा, पत्नी का महान कष्ट, स्वजनों का आर्तनाद और प्रजावर्ग का शोक भी उन्हें कर्तव्य-पथ से विचलित नहीं कर पाया अपने धर्म में दृढ़ रहते हुए वे कहीं भी गुरुजनों से तर्क-वितर्क नहीं करते, सदैव अपनी धर्म-मर्यादा में स्थित रहते थे । माता कैकेयी द्वारा पक्षपात भरा व्यवहार किये जाने पर भी भगवान श्रीराम उन्हेंजननीकहकर पुकारते और उन्हें प्रणाम करते थे वनवास से लौटने पर वे सबसे पहले माता कैकेयी के चरणस्पर्श करने गये

श्रीरामजी की अपने माता-पिता गुरुजनों के प्रति ऐसी दृढ़ भक्ति को अगर आज का मानव चरितार्थ करे तो घर-घर में रामजी का प्राकट्य हो जाय यदि वह प्रभु श्रीराम के उपरोक्त प्रकार के सुंदर जीवन-प्रसंगों से शिक्षा लेकर, रामजी के सद्गुणों को अपना आदर्श बनाकर अपने भाइयों, माता-पिता, सगे-संबंधियों तथा अन्य लोगों से व्यवहार करे तो भाई-भाई, पिता-पुत्र आदि के बीच कलह-मनमुटाव का लेशमात्र नहीं रहेगा और परस्पर प्रे स्नेह का व्यवहार बढ़ता जायेगा हम सभीका यह कर्तव्य है कि भगवान श्रीराम के आदर्शों का अनुसरण करते हुए अपने जीवन को परम उन्नति - भगवत्सुख की प्राप्ति के रास्ते ले जायें

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